23. स्वावलम्बन
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मानव कुल में समाधान के अनंतर स्वावलंबन की बात आती है। स्वावलंबन का जो मूल रूप होता है, परिवार की आवश्यकता उसका मूलभूत स्वरूप है। परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना, इसी का नाम है, स्वावलंबन। तो आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने का जो, अर्हता जो है, परिवार में इसीलिए रहता है, हर एक मनुष्य में जीवन शक्तियाँ अक्षय बल, अक्षय शक्तियाँ होने के आधार पर आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना सहज संभव है, जिससे मानव कुल में समृद्धि की बात शुरुआत हो सकती है। कम से कम परिवार में ये बात को, हर एक परिवार में इस बात को परीक्षण किया जा सकता है और प्रमाणित किया जा सकता है।
प्रश्न : बाबाजी, ये जो मनुष्य के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण जो मुद्दा है, खासकर आज के जमाने में रोजी-रोटी का भय, और वो भय मनुष्य को बहुत प्रकार से करने योग्य कामों को करने नहीं देता, और बहुत सारे ना करने लायक जो काम हैं, चोरी, भ्रष्टाचार, दबाव, कुंठा, उसको करने की बाध्यता हो जाती है, तो आज का आदमी, आज के जो भारतीय परिस्थितियाँ हैं उसमें, स्वावलंबन के क्रम में क्या कर सकता है, स्वावलंबन का स्वरूप क्या है? आज हम उसको व्यवहार रूप में उतार के रोजी रोटी के भय से, किस तरह मुक्त होकर सच्चाईयों की तरफ गतिशील हो सकते हैं?
उत्तर : उसके बारे में भी बात हुई, हर परिवार में एक आवश्यकता का, एक सीमा बनती है और स्वावलंबन तभी सार्थक होता है जब समाधानित होते हैं हममें। भारतीय परिस्थितियाँ हों, अभारतीय परिस्थिति हों, इसमें इसको कोई मतलब नहीं रखता। स्वावलंबन समाधान के बाद संभावित हो जाता है। और उसका शुरुवात यहीं होता है परिवार की निश्चित आवश्यकताएँ होते हैं, परिवार के, परिवार में जितने भी भागीदार रहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति ही परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य वो रहते हैं, क्योंकि समाधान सम्पन्न होने की बाद इस प्रकार की स्थिति बनती है। उसका दूसरा बहुत ही आश्वस्त होने की बात ये है, आज भी उत्पादक जो होते हैं, ये धरती में दस प्रतिशत से पंद्रह प्रतिशत आदमी उत्पादन करते हैं, बाकी सब लोग खाये रहते हैं। आज भी वैसे ही है, किन्तु इसको हम नहीं अनुभव कर सकते हैं समृद्धि को ,अनुभव इसलिए नहीं कर सकते हैं, हम समाधानित नहीं हैं, मूल में ये है। समाधानित होने के उपरांत मनुष्य में स्वाभाविक रूप में समृद्धि का अनुभव करने का स्वाभाविक गुण पैदा हो जाते हैं और समाधान में समृद्धि सहयोगी है। साथ साथ दूसरा विधि भी सोचा जा सकता है, समाधान के अनंतर समृद्धि भावी है, ऐसा सोचा जा सकता है।
तो संग्रह सुविधा विधि से भी हम समृद्ध नहीं हो पाते हैं, दूसरा भक्ति विरक्ति विधि से भी समृद्ध नहीं हो पाएंगे। ठीक है, तो समाधान समृद्धि, ये इसका शुरुवात है, ये प्रत्येक परिवार में इसको परीक्षण कर देखा जा सकता है। इसको हमने स्वयं परीक्षण कर देखा है, तो इसमें कोई तकलीफ़ नहीं होती है। थोड़ा सा अपने मन को एक सजाने की बात है ये, मन सज गया माने ठीक हो गया। मन में सजने का मतलब क्या है, दीन-हीनता से मुक्ति पा जाएं, माने पराधीनता