19. पर्यावरण संतुलन
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 9, time 00:00 -11:07
प्रश्न : पदार्थवस्था के क्रम में नैसर्गिक संतुलन और पर्यावरण को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर : बहुत बढ़िया! नैसर्गिकता का पहले अपन समझ लें, हम सभी ओर से घिरे हैं जिससे, उसको नैसर्गिक कहा जा सकता है। जैसा ये चार दीवाल से हम घिरे हैं, दीवाल हमारा एक नैसर्गिक हो गया। ये घर, बहुत सारे झाड़, पौधे से घिरा हुआ है, ये भी इस घर का नैसर्गिकता हो गया। ये झाड़, पौधे और छोटे बड़े पर्वत, नदी, नाला, जंगल से घिरी हुई है, ये इसका नैसर्गिकता हो गया। इस विधि से चल करके हम यहाँ पहुँचते हैं कि इस धरती से ले कर ग्रह, गोल, नक्षत्र, आकाश गंगा से लेकर नदी, नाला, पहाड़, जंगल ये सभी चीज़ हमारे लिए नैसर्गिकता है। दूसरा भाषा है ऐसे नैसर्गिकता को हम पर्यावरण भी कहते हैं। हम जहाँ तक हस्तक्षेप कर सकते हैं, वहाँ तक को हम पर्यावरण कहते हैं। हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण का सीमा निर्धारित होती है, नैसर्गिकता काफ़ी आकाशगंगा तक सारे अस्तित्व से घिरी हुई हम हैं और हरेक एक पूरा अस्तित्व से ही घिरी हुई है। अस्तित्व में सब कुछ समाया ही है। इस ढ़ंग से नैसर्गिकता पर्यावरण का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। अभी नैसर्गिक विधि से चलकर नैसर्गिकता के साथ मनुष्य जो कुछ भी कार्य व्यवहार किया, इसका प्रभाव क्षेत्र क्या हुआ? इसका अध्ययन ही कुल मिलाकर के पर्यावरण का अध्ययन है।
पहले अपन वो बात को तय कर चुके थे कि विज्ञान संसार आने के बार्द ईंधन संधान के बारे में हम विवेकी नहीं हो पाये, इसका परिणाम क्या हो सकता है, इसको सोच नहीं पाये, ईंधन को हमने गलत ईंधन को उपयोग करना शुरू कर दिया। गलत ईंधन दो ही चीज़ है, कोई एक हज़ार चीज़ भी नहीं है। पहला है खनिज कोयला, दूसरा है खनिज तेल। ये दो ही चीज़ हुई गलत ईंधन। मनुष्य के लिए विषाक्त[1] वस्तुओं से बनी हुई ये झाड़ पौधे दब करके कोयला बना है, कोयला में ही निहित तेल हमको खनिज तेल के रूप में मिलता है, ये बात को पहले स्पष्ट किया था। तो इसको जलाने पर जो मनुष्य के लिए हानिप्रद वायु है, उसको तैयार कर देता है। वो चारों तरफ फैलता है, अंततोगत्वा आदमी मरणासन्न स्थिति में आता है।
एक तो बात ये हुई। उसी के साथ-साथ और एक विन्यास कर दिया - ईंधनावशेष जो धरती की रक्षा कवच थी, उसको हस्तक्षेप कर दिया, उसको क्षति ग्रस्त कर दिया, धरती को बीमार बना दिया। ये कुल मिला करके अभी तक बीती हुई गाथा का परिणाम, दुष्परिणाम जिसको कहा जाए, वो इस ढंग से आ गई। इसको हम कहते हैं पर्यावरण का अध्ययन। तो दुष्परिणामों से जो हो गई है, हो गई है। उसको ठीक करने वाला कौन है? मनुष्य ही करेगा। मनुष्य ही ठीक करने के लिए क्या कर सकता है? या ये धरती स्वयं ठीक कर लेगा? दोनों बात हो सकता है। हम एक यहाँ उदाहरण देना चाहते हैं, कोई भी आदमी रोगी होता है, उसको दवाई, पानी, पथ्य परहेज़ ये सब कराया जाता है। करने पर दवाई से रोग ठीक होता है, शरीर स्वयं रोग को ठीक कर लेता है, ये प्रश्न बना ही रहता है। उसमें हमारा
विषाक्त : विष से युक्त, विष में बुझा हुआ; toxic, aconitic ↑