5. दर्शन, वाद और शास्त्र
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जीवन अनुभव दर्शन के साथ जो अनुभवात्मक अध्यात्मवाद लिखना और वाद लिखने के बाद शास्त्र लिखना, शास्त्र लिखने के बाद योजनाओं को लिखना - ये कार्य संपादन मैंने किया है। तो किस अर्थ में कर दिया भाई? मनुष्य जो व्यवहार और प्रमाण से लेकर अनुभव तक मनुष्य - इसका लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई इतना है। व्यवहार प्रमाण से लेकर, कर्म प्रमाण से लेकर, विचार में समाधान प्रमाण से लेकर और अनुभव प्रमाण तक आदमी पूरा लंबाई चौड़ाई है। इसीलिए अनुभव दर्शन भी लिखा, व्यवहार दर्शन भी लिखा, अभ्यास दर्शन भी लिखा और कर्म दर्शन भी लिखा। इसीलिए लिखा - कुल मिला करके संज्ञानशीलता संवेदनशीलता के साथ नियंत्रित होता रहता हुआ, संवेदनाएँ नियंत्रित रहता हुआ, देखने की दृष्टि से, समझाने की दृष्टि से, समझने के बाद प्रमाणित होने की दृष्टि से इसको ऐसा लिखा। इस ढंग से पूरा दर्शन, विचार, शास्त्र और योजना निष्पन्न हुई। ये पूरा सहअस्तित्व पर निर्भर है। इस सहअस्तित्व में ही हम सभी प्रमाणों को सभी अवस्था में प्रस्तुत कर पाते हैं। अनुभव को भी प्रमाणित कर पाते हैं, न्याय को भी प्रमाणित कर पाते हैं, समाधान को भी हम प्रमाणित कर पाते हैं। इस ढंग से इन तीनों चीज़ों को प्रमाणित कर देना ही, कुल मिला करके, जाग्रत जीवन का रास्ता है। इन जाग्रत जीवन के रास्ता में संवेदनाएँ नियंत्रित होते हैं, व्यवस्था के अनुकूल हो जाते हैं, कोई उद्धमबाज़ी करते नहीं हैं, आराम से जी सकते हैं, सुख से जी सकते हैं, परस्परता में विश्वास निर्वाह हो सकता है। ये बात है। इसीलिए ये शास्त्र लिखा, दर्शन लिखा, योजना लिखा।
दर्शन का मतलब तो आपको समझा दिया - दर्शन का मतलब ही है दृष्टा पद प्रतिष्ठा में जीवन है, सम्पूर्ण नियामत[1] वस्तु को स्वीकार लेना ही यथावत, माने सत्ता में संप्रक्त प्रकृति को स्वीकारा, सम्पूर्ण क्रियाओं को स्वीकारा, विकास को स्वीकार, विकास क्रम को स्वीकारा, जीवन को स्वीकारा और जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप में जागृति को स्वीकारा, जागृति को प्रमाणित करने की विधि को प्राप्त कर लिया है, ये ही कुल मिला करके शास्त्रों में विधि को निश्चयन किया गया - किस विधि से हम जागृति को प्रमाणित करते हैं। यदि जागृत हो जाते हैं, हम जागृति को कैसा व्यवहार में प्रमाणित करते हैं, व्यवस्था में कैसा प्रमाणित करते हैं, उत्पादन में कैसा प्रमाणित करते हैं - इसको स्पष्ट रूप में पहचानने के लिए अध्ययन कराया है, अध्ययन के लिए प्रस्तुत किया है।
समझना तो व्यक्ति से व्यक्ति ही समझेगा, वो केवल पठन के लिए ये पुस्तिका होता है, समझने के लिए आदमी होता है। पुस्तक से कोई चीज़, सही चीज़, समझ में आएगा नहीं। कोई आदमी के सम्मुख ही, आदमी के सान्निध्य में ही सही चीज़, सही ढंग से दूसरे आदमी को समझ में आता है। इस ढंग से अध्ययन को हम मनुष्य को हटा करके कोई अध्ययन नहीं करा सकते हैं। सूचना दे सकते हैं, सूचना शब्द होते हैं, उससे उत्साह बढ़ सकता है, जिज्ञासा भी आ सकता है किसी-किसी को। बहुत कम लोगों को जिज्ञासा आएगी, किन्तु सूचना सब को हो जाती है। इसको देखा गया है। इसको हमारे सारे कार्यक्रम के क्रम में इसको मूल्यांकित की गई है। इस ढंग से लिखने का जो ज़रुरत कैसे पड़ी है? दर्शन जागृति को इंगित कराना बहुत ज़रूरी रहा, जाग्रत जीवन ही दर्शक होता है, जीवन का भी दर्शक,
नियामत : ईश्वर प्रदत्त वैभव, धन-संपत्ति ↑