4. अनुभव व जागृति
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 3, time 15:28 - 42:23
अब आदमी स्वयं ये तय करें कि संवेदनाओं का आस्वादन करना है, मूल्यों का आस्वादन करना है? इस ढंग से ये अध्ययन की गरिमा है। इसमें महिमा भी इसी प्रकार आता है। इस ढंग से जीवन स्वयं में जाग्रत होने वाली बात जागृति का प्रकाशन में मानव परम्परा आश्वस्त होने की बात, फलस्वरूप हम परिवार में सुख समृद्धि, समाज में सुख समृद्धि और वर्तमान में विश्वास, और व्यवस्था में हम सुख समृद्धि विश्वास और सहअस्तित्व को प्रमाणित कर लेते हैं। ये छोटा सा एक प्रस्ताव, इस पर हर व्यक्ति अपने को शोध कर सकता है और परीक्षण कर सकता है, निरीक्षण कर सकता है, सोच सकता है और निर्धारित कर सकता है। इसमें हर व्यक्ति स्वतंत्र है। स्वत्व क्या होगी? स्वतंत्रता होगा तो स्वत्व क्या होगी? जागृति ही होगी, समझदारी ही होगी, प्रमाण ही होगी, प्रमाणिकता ही होगी - ये स्वत्व है। तो इस ढंग से जागृति ही मानव का स्वत्व है। स्वतंत्रता, इसको अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है और समझाने के लिए, अभिव्यक्त होने के लिए स्वतंत्र है। इन दोनों विधि है। इस दोनों विधि को ऐसा हम भाषा प्रयोग किया है - अनुभवमूलक विधि, अनुभवगामी विधि। अनुभवमूलक विधि से हम प्रमाणित होते हैं और अनुभवगामी विधि से हम प्रमाणों को दूसरों को बोध कराते हैं। अभी जो मैं कर रहा हूँ ये अनुभवमूलक विधि से, आपको बोध कराने की इच्छा से हमारे अभिव्यक्तियाँ हैं।
अभी आप हम इस बात पर यकीन करने योग्य स्थली में पहुँचे, जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव होता है। यही मानव संवेदन विधि से जब सभी कार्यकलापों को योजित करता है, भ्रमित आदमी कहलाता है। उसके मूल में शरीर को जीवन मानना ही मूल मुद्दा रहता है। दूसरा, जाग्रत मानव यही स्पष्ट किया गया कि हम अपने चिंतन विधि से जागृति को पहचान लेते हैं। क्या जागृति को पहचाना भाई? जीवन क्रियाओं को पहचानना पहला जागृति है। अस्तित्व सहज नियति को पहचानना जागृति दूसरा पक्ष है। इन दोनों का योगफल में, हर मोड़ मुद्दे में समाधानित होना जागृति का तीसरा पक्ष है। और ये तीनों होने के पश्चात चौथे पक्ष है हर कार्य व्यवहार में हम न्याय को प्रमाणित कर देना। ये चौथा पक्ष है। इस ढंग से हम को प्रमाणित करने की चार पक्ष आता है।
इसमें से एक चिंतन पक्ष के बारे में बात बताई थी - जब हम संवेदनशीलता संज्ञानशीलता के मुद्दे को साक्षात्कार करते हैं, संवेदनशीलता प्रभावित होने के बाद संवेदनशीलताएँ नियंत्रित होते हैं। ये बात यदि हमको पूरा का पूरा स्वीकृति होती है, ये तो स्वीकृति सबको होता है - भ्रमित आदमी को भी स्वीकृत होता है; किन्तु उसमें स्वीकृति के बाद निष्ठा पैदा हो जाए, उसके लिए साक्षात्कार आवश्यकता है। साक्षात्कार चिंतन में ही होता है। ये चिंतन में हम अपने को नियंत्रित पा लिया, हमारे व्यवहार में हम नियंत्रित होना प्रमाणित हो जाता है। चिंतन में हम समाधानित होना पा गया, व्यवहार में हम समाधानित होना पाते ही हैं। चिंतन में हम न्यायिक होना पा गए, और व्यवहार में हम न्यायिक होना पा ही लेते हैं। ये हमने शतशः इसको देखा है। एक भी भाग की कमी नहीं है। सम्पूर्ण भागों में जाँचने के बावजूद भी हम यही चीज़ पाते हैं। इसको पाने के बाद ये पता लगता है मानव कितना बड़ा है। अभी तक हमारा जो, एक प्रकार से, बचपना किए हैं, आदमी को यंत्र में बेड़ने के लिए अथवा किताब में बेड़ के देखने के लिए कोशिश किया, ये कितने बचपने की बात है, ये सबको मूल्यांकित होना बन जाता है। तो ये बहुत महत्वपूर्ण घाट है ये। इस घाट को पार