40. कम्पन तरंग से ज्ञानोदय
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 17, time 00:00-21:10
प्रश्न : कंपन प्रदत्त तरंग से ज्ञान का उद्घाटन का व्याख्या?
उत्तर : जैसा हम कभी भी आँखों से देखते हैं, हाथ से देखते हैं, और किसी भी विधि से हम देखने का प्रयोग करते हैं, तो उससे जो कुछ भी व्यंजना होती है, जैसा आँख के ऊपर प्रतिबिम्ब आता है, स्पर्श के साथ ठंडा, गर्मी आता है, नाक के साथ सुगंध, दुर्गंध आता ही है, इसी प्रकार जो सारे विधि से देखने की विधियाँ हैं, उसको हम स्वीकारने पर जीवन में एक कंपनात्मक गति होती है। वो कंपन स्वयं में कहाँ से आ गई? जो मेधस तंत्र मे जो कंपन पैदा हुई, इन सबसे व्यंजित होने के लिए, ये कैसा व्यंजित हो गया भाई, स्वीकार कैसे कर लिया? पहले से जीवन शरीर को जीवंत बनाए रखा था, इसीलिए व्यंजित हुआ। यदि जीवन शरीर को जीवंत नहीं बनाए रखेगा, ना ठंड़ी लगेगी ना गर्मी। आप देखते ही हैं, जब जीवन शरीर को छोड़ देता है, वो ले जा करके जला देते हैं। कहाँ ठंडी लगता है, कहाँ गर्मी लगता है?
प्रश्न : जीवंत बनाए रखने के लिए जीवन क्या प्रक्रिया करता है?
उत्तर : जीवंत बनाए रखने के लिए, पहले अपन एक बार हो चुके हैं इसको record किये हैं। क्या है, शरीर की रचना प्राणकोशा से है, प्राण कोशाएँ छलनी के रूप में पूरा रचना को मांस रचना, रस रचना, व सप्त धातु रचना किया रहता है, और इनमे आर पार होने की विधि, एक जीवन परमाणु मे अर्हता रहता है। (आर पार होने भर से..) हाँ, इसमें खिड़की बने ही रहती है, इसी का नाम है छलनी। छलनी है तभी तो आर पार है। ठीक है? इसमें जीवन जो है ना, हर जगह में से घूमता ही रहता है, इसलिए हर प्राणकोशा जीवंत रहता है। जीवंत का मतलब क्या हो गया? जीवन के जीवित रहकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धेन्द्रियों का संकेतों को ग्रहण करने योग्य रहता है। यदि शरीर जीवंत नहीं रहेगा, वो इसको ग्रहण करेगा नहीं। उसका प्रमाण यही है, कोई-कोई जगह मे कोशाएँ बिल्कुल मृत रहते हैं। उसको क्या कहते हैं? मूर्छित हो गये हैं, मर गये हैं।
प्रश्न : बाबा पेड-पौधे की जो प्राण कोशिका है, उसमें तो जीवन नहीं घूमता है, फिर भी जीवित रहते हैं?
उत्तर : वो जीवंत नहीं रहते हैं, सप्राणित रहते हैं।
प्रश्न : बाबा, सप्राणित और जीवंत में अंतर स्पष्ट अभी हो नहीं पाया?
उत्तर : देखिए सप्राणित रहने से, मनुष्य की शरीर में जीवंत रहना पता लगता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्धेन्द्रियों को ग्राही विधि से, और वो विधि झाड़ में होता नहीं। इतना ही बात है।