46. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 3
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प्रश्न : अध्ययन के संबंध में आपने लिखा है ‘‘क्रिया का अध्ययन, ऋणात्मक व धनात्मक, रूप, गुण, स्वभाव, धर्म से संबंधित रहेगा ही। अध्ययन के ऋणात्मक पक्ष से विकास संभव नहीं, केवल परीक्षण, निरीक्षण, सर्वेक्षण की संज्ञा उचित है। धनात्मक विकास के लिए मूलतः उद्देश्य की कल्पना, या आभास, या आवश्यकता की अनुभूति रहना आवश्यक है, जिसके लिए सर्वप्रथम अध्ययन, द्वितीय प्रयोग व अभ्यास, तृतीय अवस्था में उपलब्धि है।” इसका व्याख्या कर दीजिए?
उत्तर : प्रमाण के उपलब्धि में हम तृप्त होते हैं। मानव समझदारी को यदि प्रमाणित करता है, वो उपलब्धि है, उपलब्धि के against में हम तृप्त होते हैं। व्यवहार में प्रमाणित हो जाता है न समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व, फलस्वरूप हम तृप्त होते हैं। हम प्रमाणित हुए, इसका गवाही भी हो जाएगी और दूसरे को भी ऐसा होता है कि प्रमाणित हुए। ये ऐसा हो जाता है। ये हमारी तृप्ति स्थली बनी। पहले हम तृप्ति स्थली को कहाँ खोजते रहे? माने बहिर्मुखी विधि में तृप्ति स्थली यही है। ये तृप्ति इकट्ठा होते-होते जीवन का पूँजी बन गई। एक तो समझदारी भी, तृप्ति भी, दोनों चीज़ जीवन अपने में अपनाता ही रहेगा। इस ढ़ंग से समझदारी को उपार्जित करना एक बात, प्रमाणित करने के लिए अभ्यास करना। समझदारी को उपार्जित करना भी एक अभ्यास हो सकता है, इसको भी हम नाम दे सकते हैं। अध्ययन करना एक अभ्यास है, ऐसा भी कह सकते हैं। किंतु अध्ययन करके प्रमाणित करना अभ्यास है, तो समझदारी को प्रमाणित करना अभ्यास है, यहाँ आ के हम टिकते हैं। पहले से अभ्यास की बात यह है, अभ्युदय के अर्थ में किया गया सम्पूर्ण कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित सभी क्रियाकलाप अभ्यास है।
कायिक रूप में शरीर के रूप में जो कुछ भी कया धरा, मानसिक रूप में जो कुछ भी किया धरा, वचन के रूप में, शब्द के रूप में जो कुछ भी किया धरा, वो कृत, स्वयं से किया हुआ, दूसरो से कराया हुआ और अनुमोदित ,अनुमोदन दिया हुआ, ये सब मिल करके हमारा अभ्यास है। अभ्यास में समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाणित होना है। ये हमारा व्यवहार प्रमाण का स्वरूप है। मानव जाति में इसके प्रति क्या सहमति उपार्जित कर पायेंगे, या उपार्जित करना जरूरी है, जरूरी नहीं है, इस पर प्रकाश डाला जाए।क्या कहना है आपका ? इसमें सहमति, ज़िम्मेवारी के प्रति हम समाज में प्राप्त किया जाए, इसके लिए 0प्रयत्न किया जाए, नहीं किया जाए, इस पर सोचिए। ये सार्वभौमी करण होता है, मानव के लिए स्वीकृत होता है, इस आधार पर सार्वभौम व्यवस्था स्थापित हो जाएगा।
प्रश्न : ऋणात्मक अध्ययन और धनात्मक अध्ययन को थोड़ा स्पष्ट कर दीजिए?
उत्तर : धनात्मक अध्ययन, ऋणात्मक अध्ययन का मतलब ये है, गुणात्मक विकास के लिए जो कुछ भी हम करते हैं, जैसा समाधान के लिए जितने भी हम अध्ययन करते हैं, वो धनात्मक अध्ययन है। प्रमाणित होने के लिए जितने भी अध्ययन करते हैं, ये धनात्मक अध्ययन है।