11. ज्ञानवाही और क्रियावाही तंत्र
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 4, time 13:42-17:45
ज्ञानवाही क्रियाकलाप के बारे में बताया - जो कान का होना, शब्द को सुनना, शब्द जो कान से सुनने वाली बात, क्रियावाही तंत्र है। हाथ में छूना, ये क्रियावाही तंत्र है, मल विसर्जन होना, क्रियावाही तंत्र है। दिल में खून धड़कना, ये क्रियावाही तंत्र है। साँस लेना, ये क्रियावाही तंत्र है। ये समझ में आता है? तो उस संवेदनाओं में प्रवृत्त होना। शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंधेन्द्रियों का हम संचालित करना शुरू करना। तो गंध से सुगंध की अपेक्षा रखना, ये ज्ञानवाही तंत्र है। साँस लेना क्रियावाही तंत्र है। कितने अच्छी बात है? जीभ में रूचि देखना, ये ज्ञानवाही तंत्र है। और शब्दों में हमारा सुन्दर शब्दों को सुनने की अपेक्षा होना, ये ज्ञानवाही तंत्र है। ठीक है ना? सुख स्पर्श को अपेक्षा रखना, ये ज्ञानवाही तंत्र है। इस बात को हम सब पहचानते ही हैं। ये ज्ञानवाही क्रियावाही तंत्रों में जो प्रयुक्ति होने वाली बात को बताया, ये भी तंत्रणा सदा बना रहता है, वो क्रियावाही तंत्र भी बना ही रहता है। इसको कहीं भी बंद नहीं किया जा सकता। ये क्रियावाही तंत्र के साथ भी जीवन शरीर को जीवंत बनाए रखने की आवश्यकता बना रहता है, तभी ये तंत्र पूरा संपादित हो पाता है और ज्ञानवाही तंत्र तो जीवन के बिना कोई काम हो ही नहीं सकता। थोड़ा सा भी जीवन ओझिल होता है, ज्ञानवाही तंत्र लुप्तप्राय हो जाता है। क्रियावाही तंत्र जो है ना, ये थोड़ा देर तक चलता रहता है, और उसके बाद वो भी बंद हो जाता है।
प्रश्न : दोनों ही मेधस से controlled है।
उत्तर : दोनों मेधस से तो control नहीं है। क्रियावाही तंत्र मेधस के ज्ञानवाही तंत्र से भिन्न रहता है, फिर भी मेधस से सम्बन्ध रखता है। ठीक है ना? वो शरीर के अनुसार क्रियावाही तंत्र है और जीवन के अनुसार ज्ञानवाही तंत्र है। ऐसा इसको पहचाना गया है। ठीक है? ये दोनों को ऐसे पहचानो। इन दोनों - क्रियावाही तंत्र से क्या-क्या क्रिया होता है वो भी स्पष्ट है, ज्ञानवाही तंत्र से क्या-क्या क्रियाएँ होते हैं, ये भी स्पष्ट हैं। उसी के साथ ज्ञानवाही तंत्र के साथ, न्याय धर्म सत्य को प्रकाशित करना भी, प्रमाणित करना भी तंत्र है। ये ज्ञानवाही तंत्र का सार्थक स्वरूप वो ही है। और प्रारंभिक स्वरुप संवेदनाओं को व्यक्त कर देना ये प्रारंभिक स्वरुप है। ये प्रारंभिक स्वरुप में जीव संसार, मनुष्य संसार की संवेदना में समानता ही रहती है। अभी ये भी बता दिए थे, जो भौतिकवाद के अनुसार मनुष्य को जीव कहते ही हैं, और अध्यात्मवादी भी मनुष्य को जीव ही कहते रहे। इस ढंग से ये काम-धाम जीव जगत की बात अध्यात्मवादी किया और उसी प्रकार ये भी मनुष्य को जीव कहते हैं। ये अभी तक की प्रचलन ये ही है।
प्रश्न : मेधस का मृत्यु होते ही क्रियावाही तंत्र बंद हो जाता है, काम करना बंद कर देता है?
उत्तर : ज्ञानवाही तंत्र बंद होने के बाद क्रियावाही तंत्र बंद होता है। ये बात है। ये इस प्रकार से काम है। तो इन काम को ठीक करने के लिए जो, शरीर में आई हुई रोगों को ठीक करने के लिए, ज्ञानवाही तंत्र भरसक प्रयत्न करता ही रहता है। जीवन ज्ञानवाही तंत्रणा से रोग को ठीक करने के लिए प्रयत्न करता ही रहता है। हर एक शरीर में। ठीक है? तो ये अंततोगत्वा नहीं होता है तो शरीर को छोड़ देता है। बस इतना ही बात है। ठीक है?