20. विकास क्रम - पदार्थावस्था से ज्ञानावस्था
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प्रश्न : पदार्थावस्था से प्राणावस्था में विकास की व्याख्या?
उत्तर : विकास की जो बात है, सीढ़ी जो बनी हुई है, चार अवस्था में यह धरती दृष्टव्य है। पदार्थावस्था - पदार्थावस्था में मृद, पाषाण, मणि, धातु - इन चारों प्रकार की चीज़ें, वो बहुत प्रचुर मात्रा में है ही हैं। ये धरती पूरा इसी पत्थर मट्टी से तो बना ही है। ये तो रहता ही है। इसी में से कुछ भाग यौगिक कार्य में शुरू करते हैं। यौगिक कार्य का मतलब ये है, दो प्रजाति की अणुऐं एक जगह में मिल लेते हैं, वो दोनों अपने-अपने आचरणों को त्याग देते हैं, तीसरे प्रकार के आचरण को शुरू कर देते हैं। जैसा -पानी को आप देखते हैं। इसमें दो प्रजाति की वस्तु होती है। एक वस्तु होता है जलने वाला, दूसरा वस्तु होता है जलाने वाला। इन दोनों मिल करके क्या कर देते हैं? अपना दोनों आचरणों को त्याग दिया। प्यास बुझाने वाले काम करने लग गए। तो इस ढंग से यौगिक परिवर्तन होता है। इसको रासायनिक ऊर्मि, रासायनिक उत्सव कहलाता है। ऐसे ही अम्ल भी बनता है, क्षार भी बनता है, इन तीनों के योगफल में अनेक रस रसायन बनता है। बन करके अंततोगत्वा प्राणकोशा बनता है, प्राणकोशा से झाड़, झंकार, जंगल, सभी बनता है।
बन करके आकाश चुंबी, दो-दो पत्ती वाला, छोटी-छोटी पौधे से लेकर आकाश चुंबी वृक्ष तक की तैयारी करते हैं, इनमें प्राण कोशाएँ अपने रचना विधियों को बदलते बदलते श्रेष्ठ श्रेष्ठतम रचना में जाते-जाते पूरा जंगल झाड़ी तो तैयार किया, उसके बाद जीव जानवरों का शरीर तैयार किया, मनुष्य शरीर को तैयार किया। प्राण कोशाएँ आप हमारे शरीर को भी तैयार किया है, और जो झाड़ जंगल भी तैयार किया है, जीव जानवरों के शरीर को भी तैयार किया है। इस ढंग से प्राण कोशाओं से बनी हुई संसार ये प्राणावस्था कहलाता है। प्राणावस्था इसी लिए नाम दिया है, प्राण कोशाओं में साँस लेना, साँस छोड़ने का काम चलता ही रहता है निरंतर, जब तक उसको हवा मिलता रहता है। उनको ज़रूरत की हवा मिलता रहता है, तब तक वो साँस लेता है, साँस छोड़ता है।
इसी लिए इसका नाम है प्रणावस्था प्राणावस्था,पदार्थावस्था से विकास है ही है। अब ये तो पता चलता ही है क्योंकि मट्टी पत्थर से तो भिन्न हैं झाड़ पौधे। उसके बाद जीव जानवर आते हैं, झाड़ झंकार से जीव जानवर अलग ही दिखते हैं। आपको पहचानने में आता है, मुझको पहचानने में आता है। जीवावस्था को हम प्राणावस्था से आगे और विकसित अवस्था के रूप में हम देखे हैं। विकास इसीलिए है, वो अपने हाथ-पैरों से चलने के योग्य हो गया, जल में भी चलने योग्य हो गया, स्थल में भी चलने योग्य हो गया, नभ में भी चलने योग्य हो गया। इस प्रकार की तीनों जगह में चलने योग्य जीवों को देखते हैं हम आप हर दिन,अहर्निश, जो ज्ञानी, अज्ञानी, विज्ञानी सब देखते हैं। सभी को ये दिखता ही है, एक सा दिखता है। ये इस ढंग से प्राणावस्था से भिन्न स्वरूप में जीवावस्था अपना वैभव को बनाए रखा है।
उसके पश्चात आता है चौथा स्थिति - मानव। मानव ज्ञानवस्था में है। मानव मन के अनुसार काम करने वाला है। कुल के अनुसार, वंश के अनुसार काम करने वाला नहीं है। एक किसान का बच्चा जा करके दर्ज़ी बन सकता है, दर्ज़ी का बच्चा minister बन सकता है, minister का बच्चा एक professor बन सकता है, एक professor का बच्चा कुम्हार बन सकता है, कुम्हार का बच्चा चोर बन सकता है, चोर का बच्चा और कोई बन सकता है, और