39. समाधान और भय मुक्ति
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अभी अपन ये अच्छी तरह से समझने की कोशिश की, एक वस्तु अपने में नियंत्रण कैसा रहता है, नियंत्रित कैसा रहता है? नियंत्रण कैसा दिखता है? इस आँखों में जो नियंत्रण रेखा को देखने की बात, आँख भी गवाही देता है, कि प्रत्येक एक चाहे एक छोटे से छोटे एक क्यों ना हो, बड़े से बड़े एक क्यों ना हो, इसके सभी ओर सत्ता घिरा हुआ दिखाई पड़ती है। आँखों मे दिखाई पड़ती है। यही चीज़ है जो इकाई की स्थिति, गति, मुद्रा, भंगिमा, विन्यास हर एक का नियंत्रण रेखा यही है। इसी से ये नियंत्रित रहने से और ड़ूबे रहने से वो अपने आप से संरक्षित रहना पाया जाता है। ये मुख्य में उस बात को ध्वनित करता है, वस्तु की शाश्वतीयता, इसी नियंत्रण वश, ऊर्जा सम्पन्नता वश नित्य वर्तमान है। ये उस जगह को ध्वनित करता है। ये ध्वनि से हम नाशवाद से जैसा भयभीत होते हैं, वो भयभीती से दूर होने की एक बहुत अच्छी रस्ता है, सुलझा हुआ रस्ता है। इसमें कोई किसी का वकालत की जरूरत नहीं है। स्वयं चिंतन पूर्वक अभयता की जगह को पहचाना जा सकता है। उसके लिए ये नियंत्रण, संरक्षण की एक झाँकी सदा-सदा प्रत्येक एक के साथ सजा ही रहती है।
एक बात आपको समझ में आता है। इसी एक के संज्ञा में जो कुछ भी है, इन्ही में कुल मिला करके यही आकर्षण, प्रत्याकर्षण, विकर्षण ये सारे चीज़, ये नियंत्रण रेखा में ही होता रहता है। नियंत्रण रेखा से बाहर जा करके कुछ नहीं होता है। अब स्वयं में एक में अनेक क्रियाएं होता है, उसमें परस्पर नियंत्रण संतुलन की बात होती है, उसमें जो कुछ भी ताकतें है, ये स्वयं के संतुलन के लिए, स्वयं लगाता है और सदा-सदा बने रहने के लिए सत्ता मे नित्य संरक्षण है ही है। इस ढ़ंग से हम नाश की भय से मुक्ति होने की मार्ग है। एक ये है। दूसरा बात आती है, नाश की भय से मुक्ति की। जीवन नित्य है, जीवन अक्षय शक्ति, अक्षय बल सम्पन्न है। जीवन का मृत्यु होती नहीं है, ना परिणाम होता है।अब होगा क्या भाई जीवन में? जागृति होगा या नहीं तो भ्रम रहेगा, दो ही धंधा है। ठीक है। इसके पहले की क्या थी? सारा भौतिक संसार में और रसायनिक संसार में श्रम, गति, परिणाम, इन तीनों पीछे पड़ा रहा। अब जीवन पद होने के पश्चात जीवन में परिणाम का बात ही समाप्त हो गई। परिणाम का बात समाप्त हो गया तो श्रम का निरंतरता हो गई, गति की निरंतरता हो गई। ऐसे तो गति का निरंतरता पहले भी था, परिणाम के साथ रहा, गति का निरन्तरता। अभी परिणाम विहीन एक गति की निरंतरता हो गई। इसी को हम कहते हैं, अक्षय शक्ति, अक्षयबल। इन अक्षय शक्ति, अक्षय बल के साथ जीवन का जो वैभव है, अमरत्व के साथ पहचानने की आवश्यकता, जो जीवन का अमरत्व समझ में आ जाए। ठीक है?
ये समझ में आने से मृत्यु भय से आदमी छुटकारा पाता है। मरने की भय से माने सर्वथा मुक्त हो सकता है। यदि भय से मुक्त हो जाता है, धरती पर आदमी सर्वाधिक काम सऊर से कर पाता है। भय से मुक्त होने से सर्वाधिक कार्यों को भय से मुक्त होकर कर पाता है आदमी। भय पीड़ित रहते हुए, सही कार्य को भी हम गलत कर देते हैं, छोटी सी बात। क्या बात है? छोटी सी बात। भय के वशीभूत हो कर हर सही कार्य को, गलत कर देते हैं। भयभीत हो गए, एक आदमी हल जोतने लगा, कूड़ सीधा होवे नहीं करेगा, कूड़ ही सीध नहीं होगा। ना दिमाग ही सीध रहेगा तो कूड़ काहे को सीध होगा भाई? तो घर के अंदर रहेगा, वो जहाँ बैठना है वहाँ बैठेगा ना और ही कोई विकट स्थिति को पैदा कर