7. मानव शरीर गुण और नस्लें
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 3, time 54:04-1:04:34
मनुष्य का गुण रचना, गुणों का प्रमाण। ये ऐसे मानी जाती है, शरीर के आधार पर गुणों का प्रकाशन होता है। ऐसा भौतिक शास्त्र कहते है क्योंकि रचना के आधार पर गुणों का बात है, ऐसा सोचते है। ये सर्वथा गलत है। सर्वथा गलत इस ढंग से है - कोई भी ऐसा नस्ल नहीं है जो कुछ करता हो, दूसरा नस्ल ना कर सकता हो। ऐसा कोई समझ नहीं है, ऐसा कोई कार्य नहीं है, ऐसा कोई उपलब्धि नहीं है,जो कि दूसरा नस्ल वाले नहीं कर पाते हों। ऐसा कोई काम आज तक आया नहीं। कोई जात वाले करते हों कोई काम, वो दूसरा जात वाले नहीं कर सकते हों - ऐसा कोई काम, धाम, समझ कुछ भी नहीं है। हर प्रकार के नस्ल वाले, रंग वाले, जात वाले, संप्रदाय वाले - जो एक व्यक्ति कुछ कर पाते हैं, समझ पाते हैं, पा लेते हैं, वो चीज़ को सभी रंग, नस्ल, जात, पात वाले पा सकते हैं। ये ऐसा हमने देखा है। इस आधार पर क्या हुआ? हमारा कुछ बातें, रंग और नस्ल होना पाया जाता है, ये तो बात सही है। किन्तु रंग और नस्ल अलग-अलग होने मात्र से, हम जो कुछ भी पाते हैं, ये वाले नहीं पायेगा, ऐसा कोई चीज़ को अलग नहीं किया जा सकता।
इसको यह भी देखा गया है कि दूध पीने वाला आदमी भी गाड़ी चलाता है और दारू पीने वाला भी चलाता है। उनके हाथों से भी गाड़ी चल जाती है, इनके हाथों से भी गाड़ी चल जाती है। उनके हाथों से भी बहुत सारे accident होते हैं, इनके हाथों से भी accident होते हैं। ये भी नहीं कि दूध पीने वालों के हाथ से कोई accident ही नहीं हुआ है - ये भी दावा नहीं किया जा सकता। इसलिए ये सभी बातें बहुत अच्छी ढंग से सोचने की काम है - शुद्ध बुद्धि से, कुल मिला करके। इस ढंग से क्या हुई? विशेष नाम की चीज़ कोई जात नहीं होती है, ना सम्प्रदाय होता है, ना रंग होता है, ना नस्ल होता है। इस ढंग की स्वरूप बनी हुई है अस्तित्व सहज विधि से। अब इसका क्या करना है पूछा? तो उसका उत्तर यही मिलता है - हर व्यक्ति, हर नस्ल वाले, रंग वाले, जात वाले - समझदार हो सकते हैं, ईमानदार हो सकते हैं, ज़िम्मेवार हो सकते हैं, भागीदार हो सकते है।और इसमें आप किसी को मना नहीं कर सकते, आप के पास कोई तंत्र ऐसा नहीं है। आप मना कर देंगे, ये होवे नहीं करेगा - ऐसा करने के लिए कुछ नहीं हुआ।
इस ढंग से क्या हुई, पहले से बनी हुई पुरोहितवाद से लेकर जो आरक्षणवाद कहते हैं या और कोई वाद कहते हैं, किसी को भी हम विशेष बनाने के लिए कोशिश करते हैं, वो सब अंततोगत्वा धरती की आदमी जात का छाती का पीपल ही होगा। ये पीपल बन के ही रहेगा, ये अंततोगत्वा आदमी को त्रस्त करके ही छोड़ेगा। क्या त्रस्त करेगा पूछा? मार काट, और कौन सा त्रस्त? लूटमार, जानमार, काटमार - ये ही त्रस्तगी का पहल है। इन पहलों में कोई ना कोई पहल से आदमी त्रस्त होगा ही। इसके पहले वैर-विरोध, गाली-गलौच - ये सब चीज़ें होते ही हैं। इसको अभी यहाँ तक लाये गये, तो भाषणों में भी बहुत सारे लोग, अच्छे-अच्छे लोग गाली दे करके अपने भाषण की हवीसों को पूरा करते हुए देखा गया। इस ढंग से आदमी जात का बहुरंगी, जो कार्यक्रम है, आदमी को कहाँ ले जाएगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। जैसा ये अनिश्चयता के साथ चलती हुई भदरंगी परिस्थितियाँ हैं, ये कहीं ना कहीं दुखद घटना के स्थान पर ही ले जाएगा। ऐसा मेरा सोचना है।क्योंकि परिशितियाँ ऐसी बन रही हैं। ठीक है? उसका ये भी एक