35. स्वास्थ्य संयम
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स्वास्थ्य का परिभाषा यही बनता है, जीवन अपने जागृति को शरीर के द्वारा मानव परंपरा में प्रमाणित करने योग्य स्थिति का नाम है स्वास्थ्य। इसमें स्वयं में आश्वस्त होने का आधार भी स्वास्थ्य के अर्थ में आता है। क्या आश्वस्त होना है? हमारा जागृति को हम प्रमाणित कर सकें। ये आश्वस्त होने का मतलब, वर्तमान में विश्वास, भविष्य के प्रति आश्वस्त, यही कुल मिला करके स्वास्थ्य का मतलब हे।
(दूसरी परिभाषा हम लेंगें जीवन और शरीर की) जीवन शरीर के साथ आश्वस्त होना स्वास्थ है। जीवन अपने में आश्वस्त होने का जो बात है, वो प्रबुद्धता ही है, संप्रबुद्धता ही है। यही बनाता है। स्वनुशासान उसी का नाम है।
(तो इसका मतलब ये है कि इस बात से जीवन आश्वस्त है जो मेरी समझदारी है उसको मैं शरीर के माध्यम से प्रमाणित करूँ) इसी का नाम है स्वास्थ्य।
संयम का मतलब होता है, तो संसार में सब नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, सत्य - 6 बिंदु हैं संयम के लिए - नियम से संयत है, नियंत्रण से संयत है, संतुलन से संयत है, न्याय से संयत है, और धर्म से संयत है, और सत्य से संयत है। ये किससे संयत रहना है ये? संयंत रहने की 6 सीढ़ियाँ हैं आदमी के साथ। इसमें से किस सीढ़ी में हम संयत रहेंगें, कोई ना कोई एक सीढ़ी में संयत रहे, मानव अपने काम निकाल ले जाएगा। किसी सीढ़ी में यदि संयत नहीं रहेगा, वो उसके बाद में पशु मानव के संज्ञा में या राक्षस मानव के संज्ञा में वो प्रमाणित होगा।
किसी भी एक सीढ़ी मे सयंत रहेगा तो मानवीयता को झेल जाएगा। बाकी की एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई कड़ी है, इससे आगे इससे आगे वो झेलने की बात आ ही जाती है।तो नियम जो होता है, आपको क्या बताया था, ठोस ठोस के साथ, तरल तरल के साथ, विरल विरल के साथ, सहअस्तित्व में होना ही नियम है। कैसा ये नियंत्रण है, सच्चाई है?है ना ? तो जैसा पदार्थावस्था प्राणावस्था के लिए पूरक होना ही नियंत्रण है। प्राणवस्था पदार्थावस्था के परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना ही नियंत्रण है। जीवावस्था और ज्ञानावस्था के परस्परता में पूरक होना ही नियंत्रण है। नियंत्रण का मतलब पूरकता के अर्थ में हे। बढ़िया है ना?
मनुष्य नियम पूर्वक रहेगा तो कैसा रहेगा? प्राकृतिक नियम, सामाजिक नियम, बौद्धिक नियम के साथ नियंत्रित रहेगा। बौद्धिक नियम में नियंत्रित रहते हैं, सुख की कल्पनाएँ, सुख पूर्ण विचार, सुख पूर्ण संकल्प, ये सब चीज़ें हमको मिलता रहेगा। फलस्वरूप ऐसे हम काम करने योग्य होते हैं। ठीक बात हो गई?
तो सामाजिक नियम को पालन करने से क्या होता हैं? स्वधन, स्वपुरूष, स्वनारी विधि से जीना बन जाता है। ये सामाजिक नियम का मतलब है, इतना ही मतलब है। कोई राम कथा ना होये, पुराण भागवत भी ना होये, इतने में जीना सामाजिक नियम है। इतना में जीया जा सकता है कि नहीं जीया जा सकता? आप ही सोच लो, ठीक है? इसमें यदि रहते हैं तो क्या हुआ? हम मानव परंपरा में नियंत्रित हो गए, कितना अच्छा हुआ। मानव परंपरा में परस्परता में