42. अनुभव - जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना
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प्रश्न : बोध और प्रमाणिकता का तृप्ति बिन्दु अनुभव है, अनुभव को इस आधार पर अच्छे से परिभाषित करने की जरूरत है, क्योंकि अभी अनुभव में पूरे चित्र दिखेंगे, पूरी वस्तु दिखेगी ऐसा हम लोगों ने समझ कर रखा है।
उत्तर : बोध के बारे में ये बताया है, अनुभव की रोशनी में, स्मरण पूर्वक, इन दोनों के बीच में वस्तु का बोध होता है। इसी का नाम अध्ययन है। अनुभव का रोशनी में वो photography है ही है। क्या photography है? जो बोध किए हो। रूप, गुण, स्वभाव, धर्म जो कुछ भी आपको बोध हुआ।
प्रश्न : क्या बोध में रूप गुण भी होता हैं?
उत्तर : एक बार यहाँ से शुरुवात करो, आगे filter लगाएंगे।
प्रश्न : अनुभव की रोशनी क्या चीज़ है? इस को clear कर दीजिए।
उत्तर : अनुभव की रोशनी है तृप्ति। जीवन तृप्ति उसका नाम है। जो आपमें भी होता है, मुझमें भी होता है। तृप्ति स्थली का नाम है अनुभव। तृप्ति स्थली का स्त्रोत, सोचते हैं? करने की एक स्त्रोत है, सोचने की एक स्त्रोत है, विचारने की एक स्त्रोत है, बोलने का एक स्त्रोत है और प्रमाणित करने का एक स्त्रोत। इन सभी स्त्रोतों से हम तृप्त होने का स्थिति का नाम है ‘अनुभव’। उसका प्रमाण क्या है? और हम यदि व्यवहार में प्रमाणित करने जाते हैं, समाधान होना ही होना। चोर सब बाहर चले गए ना? सारी चोरी चली जाती है बाबा, यही तकलीफ़ है इसमें! हम जब कभी भी प्रमाणित हुए समाधानित होना है, समाधान होना है। क्या समाधान है? जो हमने बोध किए थे, प्रमाणित किए, इन दोनों में तृप्ति मिली, इसका नाम है ‘समाधान’। कार्य कारण का पूर्ण तृप्ति, कार्य को भी हम समझे हैं, कारण को भी हम समझे हैं, इन दोनों की तृप्ति बिन्दु। कारण के अनुरूप कार्य हो गया, कार्य के अनुसार कारण संतृप्त हुआ, प्रमाणित हुआ।
इसको हम तृप्ति बिन्दु के रूप में पहचानते हैं, इसका नाम है समाधान। और कार्य और फल। कार्य और फल के साथ यदि तृप्ति मिलती है, उसका नाम है अनुभव, समाधान। जैसा आप कोई कार्य किया, वो सफल हो गया तो तृप्ति मिलती है ना? हर जगह में कार्य और कारण की तृप्ति, विचार और कार्य की तृप्ति, सोच और निर्णय की तृप्ति और पाया हुआ जितना भी ज्ञान है उसका वितरण और उसके फलन में तृप्ति, ये तृप्तियाँ मिलती रहती हैं, ये निरंतर तृप्ति की रास्ता बनी हुई है। वो तो अतृप्ति की जगह-जगह में जीने के लिए हम घर बनाते है, घोंसला बनाते है। निरंतर जो तृप्ति है अस्तित्व में वो ही अनुभव है।
प्रश्न : बाबाजी जानने मानने की तृप्ति बिन्दु साथ-साथ है, या जानने की अलग तृप्ति, मानने की अलग तृप्ति?