13. अखण्ड समाज व्यवस्था
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जीवन शुभ चाहता ही है, इसी आधार पर अनुसंधान सम्पूर्ण होता है, जागृति तक पहुँचते हैं। इसके लिए प्रधान स्थली परिवार है। परिवार और बहुत सारे परिवारों के साथ ही एक परिवार जीना, देखने को मिल रहा है। इन सभी परिवारों के साथ शिक्षा संस्कार कार्य एक परंपरा है। उसी के साथ-साथ ये समझदार होना, नहीं होने वाला बात घटित होता है। अभी तक की मनुष्य को समझदार बनाने का कोई शिक्षा संस्कार की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। अभी अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चितंन के अनुसार ये स्वाभाविक रूप में आती है। इस आधार पर यदि हम सोचना शुरू करते हैं, अपने में एक बहुत अच्छी शुरूआत ये हो सकता है, हम अच्छे ढंग से, अनुसंधान को, शोध को, कार्य को शुरू कर सकते हैं। हमको जागृत होना है, ये उद्धेश्य बनता है। जागृत होने के लिए, वस्तु को जैसा है, वैसा वस्तु को समझने की बात आती है। ऐसे समझदारी विकसित होने के उपरान्त ही, हम जागृति पथ पर चलना शुरू करते हैं। ऐसे मुद्दे को पहले अपन तय कर लिए हैं - अस्तित्व को पूरा समझने पर सहअस्तित्व के रूप में समझदारी होती है, जीवन को समझने से समझदारी होती है, मानीवयता पूर्ण आचरण को समझने से समझदारी होती है। इन तीनों मुद्दा यदि समझ में आती है, तब हम समझदार हो पाते हैं, इसके पहले नहीं हो पाते हैं। इससे ज्यादा हमको आवश्यकता नहीं बनती है।
इतने में हम समझदार हो करके एक परिवार में हम प्रमाणित होना शुरू कर देते हैं। क्या प्रमाणित होते हैं? परिवार व्यवस्था में हम प्रमाणित होते हैं। परिवार के समाधान, समृद्धि में भागीदारी कर पाते हैं। फलस्वरूप हम आगे समाज के भागीदारी करने के लिए व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के क्रम में ही हम सम्पूर्ण अपने जागृति को प्रयोग कर पाते हैं। और बाकी जगह में सम्पूर्ण जागृति प्रयोग नहीं हो पाता है। समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना ही परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था का मतलब है। इस विधि से हम बहुत जल्दी-जल्दी अपने को जागृति पूर्ण होकर हम स्वस्थ परिवार के रूप में जीकर समाधान, समृद्धि को प्रमाणित करते हैं, साथ ही उपकार कार्य करते हैं। उपकार के रूप में शिक्षा देते हैं, संस्कार देते हैं और न्याय को परस्परता में ध्रुविकरण करते हैं, प्रमाणित करते हैं, इस ढंग से उपकार कार्य शुरू होता है। न्याय पूर्वक जीने से उपकार है, समाधान समृद्धि पूर्वक जीने से उपकार है और समझदारी को बारंबार हम आगे पीढ़ी को अर्पित करने में उपकार और स्वायत्त रहने से उपकार और स्वावलंबी रहने से उपकार। इस ढंग से मनुष्य की उपकार की एक सऊर, एक आबरू अपने आप में बनता है। इसमें जी करके ही आदमी अपने को सुखी होना पाता है और दूसरों को सुखी करना पाता है। यही मुख्य मुद्दा है, परिवार का। ऐसे अनेक परिवार एक गाँव में होते हैं, ऐसे अनेक गाँव या देश धरती मिल करके एक समाज होता है।
प्रश्न : मूल्य मूल्यांकन उभय तृप्ति को स्पष्ट करें।
उत्तर : परिवार में तृप्ति का जो स्त्रोत है, वो बात पर ध्यान देना आवश्यक है। परिवार में सम्बंधो का पहचान एक आवश्यक है, सम्बोधन तो रहता ही है, पर सम्बन्धों को पहचानने के बाद मूल्यों को निर्वाह करने की बारी आती है।