8. जीवन और शरीर का सम्बंध
प्रश्न - माँ का जीवन और बच्चे का जीवन का जो व्यवस्था होती है, उसके बारे में बताइये।
उत्तर - ये भी एक मुख्य बात है, एक अच्छे सूझ-बूझ के ही बात है कि पेट में शिशु का रचना काल में माँ का संस्कारों का क्या प्रभाव है वाला बात आती है। उसके लिए बहुत अच्छी बात ये है पाँच महीने के बाद जैसे ही जीवन शरीर को संचालित करना शुरू करता है, जैसे आप हम सुनते हैं, वैसे ही माँ के सारे सुनी हुई बातों को शिशु सुनता ही रहता है। क्या बात है l यही गर्भगत् संस्कार है। गर्भ में शिशु रहते समय में कोई जो संस्कार होता है, क्या होता है? माँ जो कुछ भी बोलती है, करती है, वो शिशु के अवगहन में आता ही रहता है। उसी प्रकार माँ जो कुछ भी सुनती रहती है, वो शिशु भी सुनता रहता है, ये मुख्य बात है। इसको आप हम परीक्षण करने के लिए कोई यंत्र-मंत्र होगा तो कर लें किंतु यही होता है गर्भ में रहते हुए शिशु का संस्कार। इससे क्या हुआ? माँ का जो देह है, यही है, गर्भ में गर्भाशय में जब तक शिशु है, तब तक शिशु में क्या संस्कार डालना है, इसको समझे रहें। इसको समझे रहना होगा तो समझदार ही होना पड़ेगा। दूसरा कोई विधि से होने वाला नहीं है।
प्रश्न : दोनों के जीवन पुंज आपस में किस तरह व्यवस्थित हैं, जो माँ का जीवन पुंज, बच्चे के जीवन पुंज से interact नहीं करता?
उत्तर : माँ का जीवन मेधस तंत्र में, ज्ञानवाही तंत्रों को तंत्रित करने में कोई अड़चन नहीं बनता है, क्योंकि जो जीवन गर्भ तंत्र में ही सीमित रहता है, शिशु का शरीर, उतने में ही दूसरा जीवन शिशु को संचालित करता रहता है। ये माँ के मेधस तंत्र से कोई संबंध नहीं रखता है। इस ढंग से ये दोनों का निश्चित कार्य प्रणाली बन जाती है। इन निश्चित कार्य प्रणाली में ना तो शिशु को माँ के जीवन अपने मेधस तंत्र में कार्य करने में कोई परेशानियाँ या अड़चन नहीं पैदा करता है, वैसे ही शिशु का मेधस तंत्र में जीवन अपने कार्य करने में माँ का जीवन कोई व्यवधान पैदा नहीं करता है। ये दोनो एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, सुखद् सहवास होता है, फलस्वरूप शिशु, श्रेष्ठतम् शरीर रचना के रूप में धरती को मिलता है और मानव परंपरा को मिलता है, माँ के गोद में होता है। इसको हर दिन हम देखते ही हैं। इस ढंग से बनता है, इसमें कोई किसी का हस्तक्षेप नहीं है। ये हस्तक्षेप वाद से कोई प्रगति होती नहीं संसार में। हस्तक्षेप केवल मनुष्यों को छोड़ करके दूसरे कोई करते भी नहीं प्राकृतिक रूप में, मनुष्य ही हस्तक्षेप करता है।
प्रश्न : जीवन और शरीर के बीच में मेधस द्वारा जो आदन-प्रदान होता है सूचनाओं का, उसको थोड़ा स्पष्ट करें।
उत्तर : संवेदनशीलता के रूप में जीते तक हम भ्रमित होने की संभावना बनी ही है, क्योंकि जीवों के सदृश्य ही मनुष्य भी संवेदनाओं का गणना करना शुरू कर देता है। संज्ञानशीलता पूर्वक जब जीना शुरू करते हैं, हमको संवेदनशीलता का समीक्षा हो जाता है। तब तक ये होने वाला नहीं है, संवेदनशीलता से संवेदनशीलता का कोई मूल्यांकन नहीं होता, ना ही उसका समीक्षा ही हो सकती है। संज्ञानशीलता पूर्वक जीना बन जाता है तब संवेदना का समीक्षा हो जाती है। उसी के आधार पर आपको पहले इस बात को स्पष्ट किया है, संज्ञानशीलता पूर्वक जीने के क्रम में संवेदनाएँ नियंत्रित रहते हैं। नियंत्रित रहने का मतलब ही यही है की व्यवस्था के रूप में व्यवस्था में संयत रहने से ही।