3. जीवन की शक्ति व बल
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जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!
अभी यहाँ जितने भी जिज्ञासु मेधावी बैठे हैं, इन सब का आज ऐसा आग्रह है, कल जहाँ तक संबोधित किए, प्रबोधित किए, उसके आगे बढ़ाने को। आगे बढ़ाने की मुद्दा भी सुस्पष्ट है। कल अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन ज्ञान, बनाम मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद की ज़िक्र की थी। उसका सार्थकता के बारे में, आवश्यकता के बारे में, एक स्वयं स्फूर्त प्रेरणा के बारे में अवगत कराने की कोशिश किए थे। उससे आप लोग सब लोग विद् हैं। आगे जो मानव शब्द आता है, अस्तित्व शब्द आता है, अस्तित्व में भी पुनः अवलोकन करने की आवश्यकता, अवलोकन का मतलब अवधारणा के रूप में वस्तु को देखने की विधि। तो अवलोकन करने के क्रम में ही अभी मानव को पहले स्पष्ट कर लेते हैं और अस्तित्व को स्पष्ट कर लेते हैं। अस्तित्व का विधि को भी समझ लेते हैं, मानव का भी जो जीवन और शरीर का समुच्चय में जो विधि है उसको समझ लेते हैं। यही मानव विधि बनेगी, अंततोगत्वा।
जो विधि व्यवस्था के बारे में आदिकाल से जो अपन फंसे हुए हैं - दिशा विहीन, लक्ष्य विहीन - विधि से सब कुछ करके, शत-विक्षत[1] हो करके गिर जाते हैं, कुछ करने जाते हैं तो अंततोगत्वा वो विफल हो जाता है और कुछ सोचते हैं उससे भद्दी ही विधि को सोचा जाता है। अंततोगत्वा भद्दी[2] से भद्दी, भद्दी से भद्दी की ओर जाते-जाते अभी हम कहीं पहुँच गए हैं जो अपने को खुद को भी इतने ज्यादा स्पष्ट नहीं है फिर भी मुद्दे के रूप में ये हो गई है, धरती रोग-ग्रस्त हो गई, मानव के पास दिशा और लक्ष्य नहीं है। ये यहाँ तक तो सुस्पष्ट है। अभी सारा प्रयास इस अभियान में यही है, तो मनुष्य का मनुष्य के लिए दिशा और लक्ष्य स्पष्ट हो जाये और धरती का रोग दूर होने की कोई विधि तैयार हो जाये। इसी आशय से इस कार्यक्रम को शुरू किया गया है। इसमें मैं समझता हूँ सहमति तो ९९ % है ही है, और रहा कि अब निष्ठा के बारे में कैसा प्रयोग कर जाए, निष्ठा को कैसा स्थापित किया जाए, निष्ठा कैसे परंपरा में प्रमाणित हो जाये - इसी आशय को लेकर ये कार्यक्रम को हम संपन्न कर रहे हैं। पहले मुद्दा तो यह है।
अस्तित्व में मानव एक इकाई है। मानव का अध्ययन मैंने किया है, मानव का अध्ययन में ये आई है- शरीर भी है जीवन भी है। जीवन का अध्ययन कैसा कर लिया? यह बात एक सुस्पष्ट प्रश्न है, यह सभी में आता है। मानव का, जीवन का अध्ययन इस प्रकार से कर लिया, उसके मूल में अस्तित्व को समझा। अस्तित्व को समझने पर यह पता चला परमाणु में विकास होता है - मूल मुद्दा यहीं से है। तो विकास का आधार परमाणु है और कुछ भी नहीं है अस्तित्व में। विकास पूर्णता का भी आधार परमाणु ही है और कुछ भी नहीं है। जागृति पूर्णता का भी यदि कोई चीज़ है वो जीवन परमाणु ही है और कोई चीज़ नहीं है। यह मुख्य मुद्दा है। तो इसमें अभी तक क्या परेशानी आई थी - उसके ओर एक नज़रिया।