37. सापेक्षतावाद और अनिश्चयवाद
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प्रश्न : सापेक्षतावाद नाम से एक चीज़ प्रचलित है, उसके अनुसार कोई भी चीज़ निरपेक्ष नहीं है। 2 चीज का सापेक्ष में ही सारी बात है, तो क्या इसको हम सहअस्तित्ववाद मान सकते हैं?
उत्तर : हमारे मानने से क्या होता है? वो जैसा व्याख्या करते हैं, वो तो सहअस्तित्व को व्याख्या नहीं करते हैं। सहअस्तित्व को ही भ्रमित हो कर सापेक्ष कहते हैं। भ्रमित भाषा सापेक्ष। पूरकता को काट करके सापेक्ष कहते हैं। हम कहते हैं सहअस्तित्व है, परस्पर पूरकता है। ऐसा शुरू करते हैं। भ्रमित होकर, इनको सहअस्तित्व का तो कोई ज्ञान नहीं है, न कोई लेनदेन है। क्योंकि काट-पीट करके एक को मोटाना है, एक आदमी काट पीटने वाला होना चाहिए, कटने वाला फसल, बहुत सारा आदमी चाहिए, एक आदमी मोटाना चाहिए बाकी सब मिटना चाहिए। उसके लिए इनका व्याख्या है सब। सापेक्षवाद का यही तो मतलब है।
प्रश्न : एक जो बड़ा major problem है, सापेक्षवाद में, कि वो होने को परिभाषित नहीं कर रहे हैं, स्थिति को परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं, सिर्फ एक दूसरे के सापेक्ष में होने को परिभाषित कर रहे हैं। उसके आधार पर निष्कर्षात्मक कुछ निकल नहीं पाता है।
उत्तर : अस्तित्व में पूरकता सिद्धांत है। ये सापेक्षता को अपने में स्वतंत्र रूप में बताना चाहते हैं, रहते हैं पूरकता विधि से। जैसा एक रेखा खींचा, दूसरा रेखा खींचा, एक रेखा थोड़ा सा ऊंचा हो गया, एक रेखा छोटा हो गया, इसको सापेक्ष कहा जाए, इसके लिए, ऊंचाई के लिए ये छोटा पूरक है, ये नीचे के लिए ऊँचा वाला ये पूरक है, ऐसा वो व्याख्या नहीं करते हैं।
प्रश्न : उससे भी ज्यादा serious मुद्दा है बाबा, दो लकीर अगर हमने लिया, तो ये दोनों लकीर का होना, अपने आप में है, ये भी नहीं मानते हैं। ये और serious बात है कि एक के सापेक्ष में ही दूसरा है, मतलब छोटी लकीर अपने आप में एक वास्तविकता है, बड़ी लकीर अपने आप में एक वास्तविकता है, दोनों एक-एक वास्तविकता हैं, उनका होना अपने आप में एक मुद्दा है। उसका स्थिति, गति को समझना मुद्दा है, उसके बाद एक के सापेक्ष में दूसरे को समझना ये दूसरी बात है। और फिर तीसरी बात उसका पूरकता को समझना कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। ये एक नम्बर और तीन नंबर को हटाकर, दो नम्बर की बात करते हैं, सापेक्षवाद में। आप हैं तभी मैं हूँ ये बात बनती है, नहीं तो मैं हूँ इसको नहीं कह सकते।
उत्तर : एक ही झाड़ में एक छोटा फल होता है, एक बड़ा फल होता है। हम देखते ही हैं। हमारा गणित के नाप के अनुसार एक बड़ा होता है एक छोटा होता है। ये छोटा होने के लिए यदि गवाही करता है ये बड़ा वाला, ये बड़ा होने का गवाही करता है एक छोटा वाला, ये दोनों को बड़ा नामकरण होने का, छोटा नामकरण होने का ये पूरकता को