10. आहार विहार
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एक सूत्र हमने लिखा है - आहार, विहार, व्यवहार बराबर व्यक्तित्व। आहार विहार बराबर स्वास्थ्य। आहार, विहार, व्यवहार बराबर व्यक्तित्व। व्यक्तित्व के बारे में लिखा है, ऐसा एक सूत्र लिखा है।
इस सूत्र के अनुसार स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए मानव अपने आहार को पहचानने की आवश्यकता है। ये बात आती है। मानव अभी तक अपने आहार को पहचाना या नहीं पहचाना- पहले उसी को सोच लो। इस बारे में हमारा उद्घोष ये है - मानव अपने मानवीय आहार को पहचाना नहीं है।
कैसा भाई? मानव शाकाहार भी करता है, मांसाहार भी करता है। बात सही है? कुत्ता क्या करता है? (दूध रोटी मांस दोनों खाता है। दोनों करता है बाबा।) आदमी क्या करता है? इन दोनों में क्या अंतर है?
आपको प्रकृति सहज विधि से पूछ रहा हूँ, इसमें हमारा कोई आरोप-प्रत्यारोप की कोई आशंका नहीं है। ना किसी के पक्षधर हूँ प्रति-पक्षधर हों, ऐसा भी नहीं है। मैं इस बात की घोषणा किया- मानव अपने आहार विधि को पहचाना नहीं है। ये बात सच्चाई है। पहचानने की ज़रुरत है कि नहीं है, बाद में सोच लीजिये। उसमें एक उदाहरण प्रस्तुत किया - कुत्ता और मनुष्य। कुत्ता कैसा आहार करता है और मनुष्य कैसा आहार करता है? ठीक है? बात पूरा हो गया? यहाँ सोचने की बनती है - आहार विहार को हम स्वयं यदि नहीं समझेंगे, कुत्ता भी संवेदनशीलता में घूमता ही है और मनुष्य भी संवेदनशीलता में ही घूमता है। उसमें भी कोई अंतर नहीं हुआ। आहार में भी अंतर नहीं हुआ। यदि संवेदनशील विधि को ही हम विहार मानें, कुत्ता के विहार में और मनुष्य के विहार में क्या अंतर होगा? सोचने की मुद्दा है, हमारा कोई इसमें recommendation नहीं है। तुलनात्मक विधि से आपको ये दो comparision के लिए आपके सम्मुख प्रस्तुत किया। ठीक है? संवेदनशील विधि की सीमा में कुत्ते, बिल्ली से और मनुष्य के संवेदनशील विधि से कोई अंतर दिखता नहीं हैं।
ठीक है? आहार में अंतर दिखता नहीं है। तब क्या किया जाए? मनुष्य अपना आहार पद्धति को पहचाना माना जाए,नहीं पहचाना माना जाए। इसी आहार विधि को भाँति-भाँति विधि से व्यापार में आदमी लगाता है, कुत्ता नहीं लगाता है - यहाँ से deviation हुआ। व्यापार कार्य में भाँति-भाँति विधि से लगाता है आदमी - किस बात को? डब्बा में बंद करके, जंका- मंका करके, इसको व्यापार में लगाता है। किस बात को? आहार को। कुत्ता वो धंधा नहीं करता है। मनुष्य और कुत्ते की अंतर यहाँ से शुरू हुआ। ये बात सही है या गलत है? तो अब क्या किया जाए? अब इस स्थिति में हम क्या घोषणा करें, मनुष्य अपने आहार पद्धति को पहचाना माना जाए, नहीं पहचाना माना जाए? इस गवाही के साथ हमारा निष्कर्ष ये है, हम मानव मानवीय आहार पद्धति को अभी तक ना पहचान पाए हैं, ना ही उसको ठीक से, निष्ठा से हम ले के चलने में ही समर्थ हुए हैं। हम कितने वर्ष पीछे हैं, कितने वर्ष तक हम संभल पाएँगें, आप सोच लीजिये। इस बीच में धरती ही बीमार हो गई, झंझटीय पैदा हो गई। अब क्या करोगे? धरती बीमार नहीं होता, अपन इंतज़ार करते - हाँ भाई, आगे युग में होगा, उसके आगे युग में होगा, उसके आगे युग में होगा।