9. मध्यस्थ मार्ग और दर्शन
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हम जितने भी मेधावियाँ यहाँ उपस्थित हैं, इनके बीच में, मध्यस्थ दर्शन के सम्बन्ध में, जो कुछ भी बातें हुई और शंकाएँ इस प्रकार से उद्भूत हुईं, ये विगत में बुद्ध दर्शन को ये मध्यम मार्ग नाम दिया है। ये मध्यस्थ दर्शन से ऐसा ध्वनित होता है, ये मध्यम मार्ग का तो काम नहीं है? ये मूल शंका ऐसा बना। उसके साथ ये बात स्पष्ट भी किए कि उस तत्काल में जो एक दक्षिणाचार[1], वामाचार[2] थी, इन दोनों के बीच में एक आचार संहिता को बुद्ध ने प्रणय किया, उसको मध्यम मार्ग नाम दिया। यद्यपि इसका आधार भिन्न है, इसके बावजूद भी आपका ऐसा पूछना है इसका आगे और भी जो दर्शन में प्रतिपादित किए हैं, उन मुद्दे पर ध्यान आकर्षण कराना चाहते हैं। वो यह है - आगे चल करके दर्शन में ये प्रतिपादन हुई है - मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ दर्शन, मध्यस्थ जीवन, मध्यस्थ बल, मध्यस्थ शक्ति - क्यों प्रतिपादित किया है।
मध्यस्थ जीवन को इस आधार पर प्रतिपादित किया है - सम विषम मध्यस्थ शक्तियाँ होते हैं। मध्यस्थ शक्ति जब जागृत होता है - सम विषम दोनो मध्यस्थ के अनुरूप कार्य करते रहते हैं - इस बात को प्रतिपादित किया है। मध्यस्थ बल का मतलब ये है अनुभव-मूलक विधि से हम व्यक्त होने से मतलब रहा। मध्यस्थ जीवन का मतलब है अस्तित्व जैसी परम सत्य में अनुभूत होकर प्रमाणित करने की क्रिया-कलाप को मध्यस्थ जीवन के नाम से नाम दिया है। ये बात यदि गले से उतरता है, मैं समझता हूँ ये मध्यस्थ दर्शन का सार्थकता आपको भी समझ में आएगी, हमें भी समझ में आएगी। इस बात के लिए धन्यवाद है आप लोगों को जो आप लोग सोचने के लिए अभी तत्पर हैं, आप लोगों में ये गहराई विधि से सोचने के बारे में जैसा अभी व्यक्त किए हैं, इसको बनाये रखेंगें, ऐसा में विश्वास करूँगा, हम बारम्बार आपको धन्यवाद देते रहूँ। जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!