44. अंतर मुखी एवं बहिर्मुखी - 1
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ये अंतर्मुखी, बहिर्मुखी का झगड़ा क्या है? ये बात आई। उस पर हमारा निष्कर्षों को अभी बताना चाहते हैं। अंतर्मुखी का मतलब है, समझदारी को उपार्जित करना, मूल्यांकन करना। समझदारी प्रमाणित हुआ, नहीं हुआ इसको मूल्यांकन करना, अंतर्मुखी कार्य है, और समझदारी को उपार्जित करना, अंतर्मुखी कार्य है। अभी हम कोई चीज़ अध्ययन कराता हूँ, जीवन में अपने ही मन से, इसको स्वीकारना ना स्वीकारना, इसको हर विद्यार्थी सोचता ही है। जैसा आप भी ये बैठे हैं, हमारे बात आप सुनते भी हैं, सुनके भी बहुत सारे बातों को आप सुनने के बाद उसके अर्थ में जाते हैं, अर्थ में जाने के बाद उसका स्वीकृति होती है, उसको प्रमाणित करने योग्य बन जाते है। अर्थ स्वीकृति होने से समझदारी हुई,अर्थ स्वीकार नहीं हुआ तो केवल सुना है।ऐसा बात बन गया। उसमें अपन ये भी एक जगह में आए कि अर्थ स्वीकार होना चाहिए। अर्थ यदि समझ में नहीं आया तो शब्द का कोई मतलब नहीं है। उसको और जगह में भी ले गए, किसी का नाम होगा तो वो नामी मिलना चाहिए। जैसा आपका नाम है, आप का नाम याद करने मात्र से आप मिले नहीं हैं। हम नाम का बड़ी ख्याति गाया।
"राम से अधिक राम का नाम", ये भी हम बताना चाहा। इस प्रकार से बहुत सारे वितण्डावाद पैदा हुआ। अन्त में ये निकलती है, यदि किसी का नाम है तो वो नामी मिलने पर ही तृप्ति होती है। नाम से कोई तृप्ति होने वाला नहीं है, यहाँ इस निष्कर्ष पर हम आ गए। मैं उस पर तुला हूँ। उसी आधार पर अंतर्मुखी जो बात होती है, ये अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन के अनुसार ज्ञानार्जन, विवेकार्जन, अथवा समझदारी से सम्पन्न होने की प्रक्रिया है। तो अभी तक अपना सोचना ये था समझदारी एक बहुत बड़ी भारी समझदारी का ही अर्थ है, माने अंतर्मुखी कार्य एक समझदारी ही है, अंतिम समझदारी, ऐसा सोच लिया। इसीलिए ये छाती का पीपल हो गया। कैसा पीपल हो गया? अंतर्मुखी जिस जिसने घोषणा किया अपने को, संसार से द्वेष के अलावा दूसरा कुछ किया नहीं। संसार को दुख रूप माने बिना अंतर्मुखी कोई होता ही नहीं है। संसार को क्लेश रूप माने बिना अंतर्मुखी हो ही नहीं सकते। इसका ये दो सूत्र है, और संसार को क्लेश रूप आदिकाल से वेदांतियों ने बताया ही है।
कर्म भी क्लेश कारण हैं, इसीलिए संसार और संसार के काम दोनों क्लेश का ही अर्थ है, ऐसा बताया। क्लेश से राहत पाने के लिए पुण्य की बात किया। पुण्य की बातों में वो कैसे गुजरा - वो पहले अपन चार वर्ण, चार आश्रम, उसके बाद उपासन विधि, ये सब आ कर के ये गुजरते हम एक जगह में आ गए हैं विज्ञान युग की एक चरण में। जिसमें विज्ञान स्वयं एक प्रकार से स्तंभित, कुंठित, निरुत्तरित होने की जगह में हम आ चुके हैं।क्या स्थिति मे आ गए? किस आशय से स्तंभित? सर्वप्रथम विज्ञान ये अपना अरमान बताया कि प्रकृति पर हम विजय पायेंगे। विजय पाने का काम करेंगे। वो नहीं हो पाया। उससे वो स्तंभित हैं।ठीक है। विज्ञान से मनुष्य को अमन चैन मिलेगा, मनुष्य सुख, शांति से जीएगा, ये दूसरा घोषणा। वो हुआ नही। और ये कलह, झगड़ा और समस्याएं हर दिन बढ़ता गया। ये तो मनुष्य के संदर्भ में हुआ। सबसे बड़ा समस्या ये आ के खड़ा हुआ, सारे मनुष्य के ऊपर तलवार ऐसा घूम गया, ये धरती ही बीमार हो गया, धरती बीमार होने से अनजान, जान, ज्ञानी, विज्ञानी सब के सिर पर एक ही तलवार घूमने लग गई।