24. भाषा
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प्रश्न : भाषा के मामले को ले करके एक समग्र दृष्टिकोण, उसमें दो तीन बिंदु बनते हैं बाबा, एक तो ये कि भारत में अभी 14 भाषाएं प्रचलित हैं, तो बच्चों को हम क्या पढ़ाएं, पहले तो ये सवाल, एक तो भाषा फार्मूला, जैसे लोकल भाषा पढ़ाएं,हिंदी भाषा,अंग्रेजी ऐसा एक चलन है। तो भाषा के आपसी झगड़े की वजह से भारतीय भाषाएँ तो उपेक्षा में चली गई और अंग्रेज़ों जाने के बाद अंग्रेजी का वर्चस्व जाग उठा। ये दुर्घटना हुआ तो इस मामले में क्या आप कहना चाहेंगे, और दूसरा भाषा की स्वयं की अक्षमता, सत्य को कहने में व्यक्त करने में भाषा की जो अक्षमता है, उसको भी देखना पढ़ेगा। मानवीय भाषा की बात आप करते हैं, तो मानवीय भाषा से आपका क्या आशय है, उसका स्वरुप क्या है? उसके द्वारा भाषा की समस्या आती हैं, उसका निवारण कैसे होगा?
उत्तर : यह तो बहुत साधारण बात है, इसके लिए अपन ने इसके पहले भी बहुत सारा इसमें नज़दीकी बिंदुओं को देखे हैं, तो मानवीय भाषा कारण, गुण, गणित के रूप में संपूर्ण होता है, सत्य को उद्धाटित करने के लिए कारणात्मक, गुणात्मक, गणितात्मक भाषा का उपयोग करना आवश्यक है।ये तीनो मिलकर के मानव भाषा कहलाता है। मानव भाषा की विशेषता यही है, या अर्हता यही है।
[कारण,गुण,गणित को ज़रा विस्तार से समझाइये ] कारण के मतलब जो कुछ भी है, जो कुछ भी दिखता है हमको और जहाँ तक कल्पनायें जाते हैं, ये सब किस विधि से है, होने का तो कारण को बताना है, होने का कारण को समझना, होने का कारण को समझने की पश्चात, उसमें गुण को कैसा पहचाना जाये,स्वभाव को कैसा पहचाना जाये, धर्म को कैसा पहचाना जाये, ये बनता है! उसमें से गुणों को जब पहचाने जाते हैं, फलों के आधार पर, फलित होने के लिए गुण को पहचाना होगा, गुण के साथ ही क्रिया-कलापों का एक निश्चयन हो पाना बनता है। तो ऐसे निश्चयन को पाने के क्रम को हम गुणात्मक भाषा कहेंगे। और जो स्वभाव धर्म, व्यापक, अस्तित्व, इसको समझने का जितने भी भाषा है, उसको कारणात्मक भाषा कहेंगे, वो होने का ही, ये दोनों, दोनों बात जुड़ता है, गणितात्मक भाषा स्वाभाविक बात है, गणना को, गणना मनुष्य के लिए एक अवश्यक कार्य है, हर बात के लिए, काल के लिए, विस्तार के लिए, गणना के लिए, ये सभी गणितात्मक भाषा के अवश्यकता है, उसको ऐसा देखा गया है।
कुल मिला करके जोड़ना, घटाना। कुल मिला करके गणित, इससे ज़्यादा गणित में कर ही नहीं सकते, इससे कम में कोई गणित होता नहीं, छोटी सी बात। उसमें दो प्रकार, एक शून्य को पहले रख करके, संख्याओं को लिख करके, हम घटाना जोड़ना मानते हैं, करते हैं। उसके दूसरे विधि से शून्य को अंत में रखते हैं। किसी भी राशी का एक भागों के साथ जोड़ना घटाना, पहले शून्य को रख करके, संख्याओं को लिखने से बन पाता है, और जो किसी राशी राशी को, एक एक राशी को जोड़ना, जोड़ना घटाने की बात, शून्य को बाद में रखने से बन पाता है, ये इस विधि से हम जोड़ना घटाने की काम करते हैं, इसको पढ़ा हुआ भी करता है, नहीं पढ़ा हुआ भी कर लेता है। काम की गणित सबके लिए सुलभ है। ये सबको आता है। और गुणात्मक, कारणात्मक भाषा में आदमी को निष्णात बनाना, पारंगत बनाना, एक अवश्यकता है! इसमें क्या हो जाता है? जीव जगत, अस्तित्व, विकास जागृति, जागृति क्रम, विकास