विपर्यय, अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति एवं अव्याप्ति दोषों से मुक्त यथार्थता का बोध सुलभ कर देता है। यही शिक्षा संस्कार की गरिमा है। शिक्षा पूर्वक ही मानव में संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था सर्वसुलभ होती है, जिसका विश्लेषण हुआ है। मानवीयता जागृति के क्रम में पायी जाने वाली एक वास्तविकता है। यह प्रमाण सिद्ध हुआ है। इसी के आधार पर मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था का विश्लेषण हुआ है।
“परिणाम में ही गठनपूर्णता की महत्ता, श्रम में ही विश्राम की आवश्यकता एवं गति में ही गन्तव्य की अनिवार्यता प्रकट है।” गठनपूर्णता गणित के प्रयोग से सिद्ध होती है। क्रियापूर्णता व्यवहार पूर्वक सिद्ध होती है। आचरणपूर्णता अनुभव पूर्वक सिद्ध होती है। ये सिद्धियाँ ही प्रमाण है। “पूर्णता त्रय” से अधिक मानव जीवन में अध्ययन प्रमाणित नहीं है। इन्हीं में, से, के लिए ही विधिवत् अध्ययन होना ज्ञानावस्था की विशेषता है। ज्ञानावस्था में ही अध्ययन पूर्ण होता है। अध्ययन पूर्णता ही समाधान है। अध्ययन पूर्णता निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही है। अध्ययन ही “प्रमाण त्रय” को प्रसारित करता है।
“प्रमाण त्रय ही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकसूत्रता का सूत्र है।” भोग और व्यापार मूलक क्षमता सार्वभौमिक संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था को प्रकट करने में असमर्थ है। “प्रमाण त्रय” पूर्वक ही मानव एवं मानवीयता की वास्तविकता स्पष्ट होती है। मानव के बिना मानवीयता तथा मानवीयता के बिना मानव की वास्तविकता स्पष्ट नहीं है। मानवीयता की अपेक्षा में ही अमानवीयता एवं अतिमानवीयता का अध्ययन होता है। अध्ययन ही वास्तविकता का दर्शन है। वास्तविकता विकास क्रमोपस्थिति है। प्रमाण ही सिद्धांत का प्रत्यक्ष रूप है जो जीवन है। प्रयोग, व्यवहार, समाधान एवं अनुभूति से अधिक जीवन नहीं है।