स्वीकृति से संकल्प, संकल्प से निष्ठा, निष्ठा से प्रतिबद्धता, प्रतिबद्धता से प्रबुद्धता, प्रबुद्धता से बोध, बोध से प्रतिज्ञा (संकल्प), प्रतिज्ञा से क्षमता, क्षमता से जागृति, जागृति से स्वीकृति व प्रमाण है।
प्रबुद्धता ही समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद एवं अनुभवात्मक अध्यात्मवाद की प्रस्थापना, स्थापना एवं अक्षुण्णता का प्रत्यक्ष रूप है।
समाधानात्मक भौतिकवाद में अर्थ के उत्पादन, उपयोग वितरण-व्यवस्था में एकसूत्रता है, जो न्याय सम्मत है। यही समाधान है। मानव में समाधान की प्यास है।
प्रत्येक व्यक्ति का उत्पादन उसकी क्षमता, अवसर, साधन एवं अनिवार्यता पर आधारित है।
“क्षमता व स्वसंस्कार” अध्ययन तथा वातावरण पर, “अवसर” व्यवस्था पर, “साधन” उपलब्धि पर, “अनिवार्यता” वर्तमान स्थिति पर आधारित है।
“संस्कार” (प्रवृत्ति) तात्रय की सीमा में “अध्ययन” निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य की सीमा में तथा “वातावरण” विशेषत: मानवकृत सीमा में है। मानवकृत वातावरण ही व्यवस्था है। अध्ययन के क्रम में मानवीयता में संस्कार शिक्षा एवं व्यवस्था की एकसूत्रता; अमानवीयता की सीमा में एकसूत्रता का अत्याभाव; अनुभव रूपी अतिमानवीयता में मानव स्वतंत्रता पूर्वक प्रमाण है, यही अभ्यास का तात्पर्य है। अर्थात् संस्कार सम्पन्न होना अभ्यास का फलन है।
जागृत मानव में 122 प्रकार के आचरण पाये जाते हैं।
जागृत मानव ही स्वतंत्रित है।
अजागृत अथवा भ्रमित मानव आसक्ति से मुक्त नहीं है, इसलिए विवेक का उत्कर्ष ही अनासक्ति सूत्र है।
विवेक का उत्कर्ष ही वस्तुगत एवं वस्तु स्थिति सत्य का प्रचोदन (यथार्थग्राही एवं प्रसारण योग्य क्षमता) है।
वस्तु स्थिति एवं वस्तुगत सत्य का अनुभव ही अनासक्ति है। वस्तुगत व वस्तु स्थिति सत्यता का अनुभव करने के लिए ज्ञानावस्था की इकाई पात्र है। इसकी चरितार्थता ही चारों आयामों की पूर्ण तृप्ति है।