मानव ही इस पृथ्वी पर अन्य प्रकृति से विकसित है। मध्यस्थता के बिना सामाजिकता सिद्ध नहीं है। सामाजिकता के बिना मानव आश्वस्त नहीं है।
मानव के चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों में मध्यस्थता सहज सुलभ है। मध्यस्थता अनुशीलन के बिना मानव में अखण्डता नहीं है। मध्यस्थता आवेश नहीं है, इसके अनुसरण पर्यन्त जागृति का अभाव नहीं है।
रूप, गुण, स्वभाव, धर्म प्रगटन क्षमता ही प्रत्येक इकाई के विकास को स्पष्ट करती है। जड़ प्रकृति में रूप और गुण, जीवावस्था में रूप, गुण एवं स्वभाव, ज्ञानावस्था में रूप, गुण, स्वभाव और धर्म का प्रकटन पाया जाता है। पदार्थावस्था रूप प्रधान, प्राणावस्था गुण प्रधान, जीवावस्था स्वभाव प्रधान और ज्ञानावस्था धर्म प्रधान प्रकटन है।
“जो जिसको प्रकट करता है, उसमें उसके स्वागत (ग्रहण) करने की क्षमता रहती है।”
रूप का मिलन रूप से, गुण का मिलन गुण से, स्वभाव का मिलन स्वभाव से, धर्म का मिलन धर्म से प्रत्यक्ष है।
प्रत्येक मानव स्वतंत्र, स्वतंत्रित एवं स्वतंत्रतापूर्ण होना चाहता है।
स्वतंत्र पूर्णता का प्रत्यक्ष रूप ही है ज्ञान विवेक सहित विज्ञान का प्रयोग, जिसमें ही नियमपूर्ण उत्पादन, न्यायपूर्ण व्यवहार, धर्मपूर्ण विचार एवं सत्यमय अनुभूति है। यही स्वतंत्रता सहज प्रमाण है, जो जागृति पर आधारित है।
स्वतंत्रताधिकार अनुभव पूर्वक मानव चेतना, देव तथा दिव्य मानवीयता की कोटि में सफल होता है। इसके पूर्व मानवीयता में प्रतिबद्धता व निष्ठा तथा अमानवीयता की कोटि में अप्रतिबद्धता पायी जाती है।
प्रतिबद्धता ही संकल्प एवं प्रतिज्ञा की क्षमता है, जो बुद्धि के जागृति का द्योतक है। यही अवधारणा का प्रधान लक्षण है।
धर्म, न्याय और नियम में प्रतिबद्धताएं है तथा साथ में अनुभूति है। इनसे अतिरिक्त संकल्प का विकल्प भावी है। उनके अतिरिक्त अस्तित्व नहीं है। जैसे असत्य, अज्ञान, अंधकार एवं मृत्यु भासित होते हुए भी स्थिति में नहीं है।