मानव में न्याय की चरितार्थता की क्षमता ही स्वतंत्रता है, यही सामाजिकता का प्राण व त्राण है। अमानवीयता (पशु मानव एवं राक्षस मानव) स्वतंत्र एवं संयत नहीं है।
मानवीयता पूर्वक मानव संयमता में, से, के लिए स्वतंत्रता का जिज्ञासु है।
देव मानव स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत है।
अतिमानवीयतापूर्ण दिव्य मानव ही पूर्ण स्वतंत्र है, जो प्रत्यक्ष है। स्वतंत्रता के प्रमाण में संवेदनशीलताएं संज्ञानशीलतापूर्वक नियन्त्रित रहना पाया जाता है।
प्रत्येक मानव स्वतंत्रता के प्रति आशुक, कल्पनाशील तथा इच्छुक है।
न्याय, धर्म, सत्य पूर्ण विधि से “स्वयं में, से, के लिए तंत्रित एवं नियंत्रित जीवन प्रतिष्ठा ही स्वतंत्रता है।”
आत्मा के संकेतानुरूप बुद्धि, बुद्धि के संकेतानुरूप चित्त, चित्त के संकेतानुरूप वृत्ति, वृत्ति के संकेतानुरूप मन है, जो क्रम से अनुभव, बोध, इच्छा, विचार एवं आशा है। यही स्वतंत्र जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। इसके विपरीत में लोकानुरूप, आशानुरूप एवं कल्पनानुरूप इच्छाएं परतंत्रता का प्रत्यक्ष रूप हैं, जबकि परतंत्रता मानव की वांछित घटना एवं उपलब्धि नहीं है।
मध्यस्थ क्रिया पूर्ण जीवन ही स्वतंत्रता है।
मध्यस्थ क्रिया का अस्तित्व है, इसलिए स्वतंत्रता की संभावना है।
मानव में उत्पादन नियमपूर्वक, व्यवहार न्यायपूर्वक, विचार धर्म (समाधान) पूर्वक अनुभव सत्य में मध्यस्थता पूर्ण होना पाया जाता है।
मध्यस्थ पूर्णता की प्रेरणा मध्यस्थ क्रिया में ही है। यही सम व विषम का नियंत्रण संरक्षण है। साथ ही मध्यस्थ जीवन की संभावना है। इसके प्रमाण परंपरा में ही दिव्य मानव जीवन है।
नियम, न्याय, धर्म और सत्य ही ज्ञान है। मध्यस्थ क्रिया ही इनका उद्घाटन करती है। इसमें पूर्ण निष्णात होने तक ही जागृति क्रम है। यही अभ्यास है।
पूर्ण जागृति परम सत्यरूपी सहअस्तित्व में अनुभूति है।
अमानवीयता में स्वतंत्रता के प्रति मानव में आशा एवं कल्पना, मानवीयता में कल्पना, इच्छा एवं संकल्प तथा अतिमानवीयता में संकल्प एवं अनुभूति पायी जाती है।