स्थिति में नेतृत्व दृष्टव्य है। इसके मूल कारण में मानव में पाया जाने वाला संस्कार एवं उसकी क्षमता में वैविध्यता है। वैविध्यता में समानता की आकाँक्षा एवं प्रत्याशा है।
प्रेरक (नेतृत्व) के मूल में दर्शन एवं विचार क्षमता ही है, जो सफल होती है। प्रत्येक सुदृढ़ विचार का आधार दर्शन ही है। अन्ततोगत्वा दर्शन क्षमता ही नेतृत्व क्षमता सिद्ध होती है। (भ्रमवश मानव अपराध और गलती सहित नियति विरोधी, जागृति विरोधी कार्यों में नेतृत्व करते हैं, ये अपराधी होते हैं।)
सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है। दर्शन में प्रकृति का विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति रूप में अध्ययन मानव के लिये प्रस्तावित है, जो स्वयं समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद तथा अनुभवात्मक अध्यात्मवाद को स्पष्ट करता है, जिससे “प्रमाणत्रय” (प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव) सिद्ध होता है। मानव जीवन में “चतुरायाम” उत्पादन, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति अविभाज्य हैं जो प्रसिद्ध है, इसलिए व्यवहारात्मक जनवाद का प्रत्यक्ष रूप न्याय सुलभ, समृद्ध जीवन में प्रतिष्ठित एवं अक्षुण्ण होना है। यही मानव में अखण्डता को स्थापित करता है, जिसकी पूर्ण सभांवना व आवश्यकता है ही। जैसे :-
1. मानव संबंधों सहित ही जन्म लेता है।
2. स्थापित संबंध में स्थापित मूल्य है।
3. सामाजिक मूल्य अपरिवर्तनीय है।
4. मानवीयता में ही अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा सिद्ध होती है।
5. मानवीयता जागृत मानव परंपरा में ही प्रमाणित होता है।
6. जागृत मानव सामाजिक न्यायिक इकाई है।
7. सामाजिक मूल्य में, से, के लिए बिना शिष्टता एवं वस्तु व सेवा की प्रयुक्ति सफल नहीं है।
8. मानव में स्वभाव सहज अभिव्यक्ति, धर्म सम्पन्नता में अनुभूति प्रसिद्ध है।
समाधानात्मक भौतिकवाद की चरितार्थता आवश्यकता से अधिक उत्पादन है, जो अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के रूप में मानवीयता में दृष्टव्य है। यही मानव की चिरकामना है जिसका