मानव ने भ्रमवश मानव एवं मनुष्येत्तर प्रकृति पर अधिकार और शासन करने का प्रयास किया। फल परिणाम में मतभेद, विरोध, द्रोह, विद्रोह, शोषण, युद्ध, प्रदूषण, मिलावट, भ्रष्टाचार जैसी अप्रत्याशित घटना हो चुकी हैं। इसी क्रम में धरती भी अस्वस्थ हो गई है। मानव को मानव पर अधिकार पाना संभव नहीं है, शिक्षा व व्यवस्था पूर्वक सहअस्तित्व को पाना ही संभव है। यही परस्पर व्यवहार की बाध्यता है। मानव के लिए अवसर, आवश्यकता, अनिवार्यता एवं लक्ष्य समान है। इसलिए मानव का लक्ष्य सुख, शान्ति, संतोष एवं आनन्द ही है। इसे सफल बनाना ही अभ्यास है।
आवश्यकता महत्वाकाँक्षा एवं सामान्याकाँक्षा की सीमा में है।
अनिवार्यता बौद्धिक समाधान (निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य) के रूप में है।
अवसर मानवीयता, अमानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्वक व्यवहार करने का है। अवसर ही मानव में विचार वैविध्यता एवं एकता का प्रधान कारण है।
विचार ही मूल्य दर्शन क्षमता है। मूल्य दर्शन क्रिया ही मानव की मूल्यवत्ता है। मूल्यों में एकता तथा मनुष्येत्तर (रूप व क्रिया) में अनेकता का अनुभव किया गया है।
मूल्य में, से, के लिए ही मानव प्रकारान्तर से समर्पित है।
संबंध व स्थापित मूल्य केवल अखण्ड समाज के अर्थ में है, अखण्ड समाज सहअस्तित्व में अनुभव का फलन है जो केवल अनुभव प्रमाण से तथा उत्पादन मूल्य प्रयोग प्रमाण से प्रमाणित है, जिसका उपयोगिता मूल्य दृष्टव्य है।
जड़-चैतन्यात्मक इकाईयों की स्थिति-गति केवल मूल्यों में, से, के लिए ही है। सभी अवस्था और पद में प्रतिष्ठित इकाईयों का मूल्य उन-उन के स्वभाव और आचरण के आधार पर गण्य है।
मानव में जो मूल्य दर्शन क्षमता है, वही मानव को व्यवहार, उत्पादन, विचार एवं अनुभूति में, से, के लिए प्रेरित करती है। यही सामाजिकता एवं बौद्धिकता का आधार है। मानव सामाजिक, न्यायिक इकाई एवं बुद्धिपूर्वक (समझदारी पूर्वक) जीने वाला अर्थात् ज्ञान विवेक विज्ञान पूर्वक जीने वाला से भी संबोधित है, इस संबोधन का अभीष्ट भी इसी क्षमता का निर्देश करता है।