पालन पाँचों स्थितियों में मानवीयता की सीमा में होता है। अमानवीयता की सीमा में इसकी अवहेलना होती है। अतिमानवीयता पूर्वक स्वभावत: चरितार्थ होती है। चरितार्थता ही मानव का अभीष्ट है।
आशा, आवश्यकता तथा अनिवार्यता पूर्वक किया गया प्रयास ही अभीष्ट है, इससे विहीन कार्यकलाप मानव में सफल नहीं होता है। अस्तित्व में जागृतिपूर्वक मानव स्पष्टताधिकार सम्पन्न एवं क्षमता को स्पष्ट करता है जो एकसूत्रता एवं सार्वभौमता है। भ्रमवश जितने भी विविधताएं हैं, उनमें एकसूत्रता नहीं होती है। यही सम्पूर्ण विरोध का कारण है। जैसे :-
सामाजिक मूल्य : जीवन मूल्य, मानव मूल्य व स्थापित मूल्य के आधार पर
शिष्ट मूल्य : निश्चित
उपयोगिता मूल्य : निर्धारित
ऊपरवर्णित तीनों मूल्यों से अधिक अनुभव मानव में, से, के लिए नहीं है क्योंकि आध्यात्मिक, बौद्धिक तथा भौतिक मूल्यवत्ता प्रसिद्ध है, जिसे प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है। सामाजिक मूल्य अनुभव में, शिष्ट मूल्य व्यवहार में एवं भौतिक मूल्य उत्पादन में उपयोगिता में स्पष्ट है।
व्यवहार एवं अनुभव निर्विरोधिता ही समाधान है। यही समाधानात्मक भौतिकवाद को स्पष्ट करता है क्योंकि व्यवहार का आधार अनुभव है तथा उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता एवं वितरण का आधार समाधान है। यही समाज एवं सामाजिकता है।
“अनुभव अपरिवर्तनीय है।” यदि परिवर्तन है तो वह अनुभव नहीं, केवल अनुभव के प्रति भास, आभास एवं प्रतीति है।
“आशाएं आवश्यकता में, आवश्यकताएं अनिवार्यता में ही संयत एवं चरितार्थ है।”
उपयोगिता मूल्य आवश्यकता में, आवश्यकता मूल्य शिष्टता में, शिष्टता मूल्य स्थापित मूल्य में, स्थापित मूल्य मानव मूल्य में, मानव मूल्य जीवन मूल्य में समर्पित पाये जाते हैं। स्थापित मूल्य ही जीवन एवं जीवन के कार्यक्रम का आधार है, इसी आधार पर संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था संरचनायें स्थित होती हैं न कि केवल उत्पादन पर; क्योंकि उत्पादन मानव के अधीन है न कि उत्पादन के अधीन मानव।