अखण्ड समाज परंपरा में स्थापित मूल्य का निर्वाह ही शिष्टता की अभिव्यक्ति तथा “अर्थ” का सदुपयोग है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में एकसूत्रता ही “न्याय” है। यही सार्वभौम कामना है, जो व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार में, परिवार के सहयोग एवं सहकार्य में, समाज के प्रोत्साहन एवं प्रेरणा में, राष्ट्र के संरक्षण तथा संवर्धन में एवं अंतर्राष्ट्रीयता के अनुकूल परिस्थिति एवं एकसूत्रता में चरितार्थ होती है। यही सर्व मानव की कामना, मांगल्य, शुभ, संगीत, वांछनीय अनिवार्यता, ऐतिहासिक उपलब्धि, नियतिक्रम स्थिति, अखण्डता, अभयता, सतर्कता एवं स्वर्ग है।
अखण्ड समाज परंपरा में स्थापित मूल्यों के निर्वाह में ही शिष्टताएं समर्पित हैं। “अर्थ” का सदुपयोग मानवीयता में चरितार्थ होता है, जो जागृति क्रम में पायी जाने वाली सुखद स्थिति है, क्योंकि देव पद चक्र में सामाजिकता है, जबकि भ्रांति पद चक्र में यह नहीं है।
शिष्टता में वैविध्यता की संभावना देश कालवश है। “अर्थ” के सदुपयोग में तथा स्थापित मूल्यों में विकल्प नहीं है। यही अखण्डता एवं अक्षुण्णता का मूल तथ्य है। इससे ही अनुप्राणित जीवन नित्य कार्यक्रम, उत्सव, समृद्धि, समाधान, उत्साह, सफलता, स्थिरता, शान्ति, संतोष एवं सुख का अनुभव करता है। यही कामना मानव में अनन्त काल से है।