व्यवस्था है। समग्र की एकसूत्रता के लिए अनिवार्यता केवल सामाजिक, आर्थिक एवं राज्यनीति ही है, जो निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही है। सम्यकता को समग्र मानव जाति में स्थापित एवं संरक्षित करना ही संस्था व परंपरा है। यही अभ्यास का लक्ष्य है।
सहअस्तित्ववादी दर्शन क्षमतानुसार ही शिक्षा व व्यवस्था उपलब्ध हुई है। तृतीय अवस्था केवल “वादत्रय” पूर्वक सिद्ध होने वाली “नीतित्रय” संबद्ध शिक्षा एवं व्यवस्था ही है।
सार्वभौमिकता ही प्रभुसत्ता है। यह केवल सत्य और सत्यता सहज सम्पूर्ण मूल्यों का प्रमाण एवं परंपरा है। वह स्थापित, शिष्ट, व्यवसाय मूल्य पूर्वक अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था है।
प्रबुद्धता ही प्रभुता, सहअस्तित्व ही सत्यता है। इसी का अध्ययन एवं शिक्षा है जिसमें प्रमाण पूर्वक “नीति त्रय” सिद्ध होता है। यही प्रभुता है जिसको सर्वसुलभ बनाना ही व्यवहारिक सत्ता है। प्रभुसत्ता का यही प्रत्यक्ष रूप एवं मानव की चिरवांछा भी है। प्रबुद्धता का तात्पर्य प्रकृष्ट बोध सम्पन्नता से है। प्रकृष्ट बोध सम्पन्नता का तात्पर्य यथास्थिति से पूर्णतया निर्भ्रम रहने से है। अस्तु, प्रभुसत्ता का चरितार्थ स्वरूप सजगता एवं सतर्कता सहित सहअस्तित्व ही है। सहअस्तित्व ही स्वयं में व्यवस्था है।
मानव की यथास्थिति जागृति परंपरा सहज वैभव है।
प्रभुसत्ता के बिना अखण्डता एवं अखण्डता के बिना प्रभुसत्ता सिद्ध नहीं है।
सत्यता के प्रति निर्विरोधिता एवं निर्भ्रमता ही अखण्डता है। निर्भ्रमता के प्रति आश्वस्त करने वाली प्रक्रिया ही सत्ता का प्रत्यक्ष रूप है, यही सबका अभीष्ट है, अप्रतिम शक्ति है। साथ ही यही मानव को देवता एवं भूमि को स्वर्ग बना देती है जिसके लिए सभी चिरतृषित है।
’सत्ता’ का तात्पर्य सार्वभौम व्यवस्था है।
सत्ता का तात्पर्य सार्वभौम है।
सत्ता का तात्पर्य ज्ञान, विवेक, विज्ञान सम्पन्नता - यही प्रबुद्धता, यही प्रभुसत्ता, यही सत्ता और सत्ता ही सार्वभौम है।
प्रभुता - स्वीकार योग्य सूत्र व्याख्या।
प्रभुता अर्थात् स्वीकार योग्य सूत्र व्याख्या और सत्ता अर्थात् सार्वभौम व्यवस्था है।