व्यवहारानुरूप जनाकाँक्षा का निर्माण होना ही जनावादीय तंत्र की सफलता है। जागृत मानव परंपरा में जनाकाँक्षाए सार्थक होना पाया जाता है।
व्यवस्था, व्यवस्थापक, व्यवस्थापित की परस्परता में; शिक्षा, शिक्षार्थी, शिक्षक की परस्परता में समन्वयता का तारतम्यता सामन्जस्यता, एकसूत्रता एवं अनन्यता को पा लेना ही सौजन्यता का प्रत्यक्ष रूप है, यही न्याय पूर्ण जीवन है। सामाजिकता का निर्वाह करने में सौजन्यता एक प्रधान शिष्ट मूल्य है। शिष्ट मूल्य ही व्यवस्था मूल्य को आत्मसात कर लेता है, जो उत्पादित वस्तु मूल्य की सदुपयोगिता है, यह प्रमाण सिद्ध है।
अशिष्टता में उत्पादित वस्तु मूल्य का नियंत्रित व समाविष्ट होना संभव नहीं है क्योंकि अशिष्टता कोई मूल्य नहीं है। वह केवल अजागृति, अज्ञान, असमर्थता का ही द्योतक है। गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया रहता है। इस सिद्धांत के अनुसार मूल्य विहीन अशिष्टता में उत्पादित वस्तु का मूल्य समाविष्ट होना संभव ही नहीं है। शिष्टता विहीन समाज, सामाजिकता, शिक्षा एवं व्यवस्था भी जनवादीय नहीं है। जनवादीय चिंतन का आधार ही शिष्टता है।