“अध्ययन की चरितार्थता आचरण में ही है।” आचरण दश सोपानीय व्यवस्था में पाई जाने वाली अनिवार्य प्रक्रिया है। आचरण विहीन इकाई नहीं है। आकाँक्षा सहित गतिशीलता ही आचरण है। आचरण ही विकास व ह्रास का प्रत्यक्ष बिन्दु है। जड़ और जीवन प्रकृति में भी आचरण का अभाव नहीं है। मानव जीवन के कार्यक्रम को अक्षुण्ण बनाने के लिए विचार श्रृंखला में सामाजिकता का अनुसंधान हुआ है। सामाजिकता की अक्षुण्णता केवल मानवीयता में सिद्ध होती है। सामाजिकता के लिये मानवीयता ही एक मात्र शरण है।
“मानव द्वारा दश सोपानीय व्यवस्था में किये जाने वाले आचरणों में ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का प्रकटन होता है।” प्रतिभा और व्यक्तित्व का संतुलन ही संतुलित जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। यही “जाने हुए को मानना और माने हुए को जानना” है। यही अर्न्तद्वन्द्व से मुक्ति एवं भौतिक समृद्धि और बौद्धिक समाधान है, जो सर्वमानव की आकाँक्षा है। यही गुणात्मक परिवर्तन का चरितार्थ स्वरूप है। जागृति क्रम में गुणात्मक परिवर्तन भावी है, जो सहज प्रक्रिया है जिसमें वेदना का अत्याभाव है। यही जीवन का संगीत है। विकास एवं जागृति की प्रत्येक कड़ी सुखद होती है। विकास एवं जागृति के अतिरिक्त और कोई शरण नहीं हैं।
“प्रबुद्धता ही प्रतिभा और आचरण ही व्यक्तित्व है।” आचरण एवं प्रतिभा सम्पन्नता के लिये शिक्षा एवं उसके संरक्षण के लिये व्यवस्था प्रसिद्ध है। प्रतिभा ही ज्ञान और आचरण ही सभ्यता एवं संस्कृति की अभिव्यक्ति है। अभिप्राय पूर्वक किया गया प्रकटन ही अभिव्यक्ति है। अभ्युदयार्थ अनुभव मूलक विधि से की गई वैचारिक प्रक्रिया ही अभिप्राय है। विधि, व्यवस्था एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में सत्यानुभूति योग्य क्षमता के प्रति जिज्ञासा भी प्रतिभा का द्योतक है। अर्थतंत्र धर्मनीति एवं राज्यनीति व्यवस्था प्रसिद्ध है। व्यवस्था ही विकास एवं जागृति क्रम सहज प्रमाण है, प्रकृति स्वयं में व्यवस्था है।
“स्वभाव, धर्म ही मौलिकता, मौलिकता ही मानव का अर्थ, अर्थ ही सार्थकता है।”
“मौलिकता ही मूल्य है। मूल्य चतुष्टय अर्थात् उपयोगिता मूल्य, सुन्दरता मूल्य, शिष्ट एवं स्थापित मूल्य ही उद्घाटन एवं प्रकटन है।” यही अभ्युदय का प्रत्यक्ष रूप है। मानव का निर्वाह अर्थात् उसका निश्चित दिशा व लक्ष्य की ओर विचार एवं व्यवहार पूर्वक वहन ही स्वभाव का प्रकटन है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अभ्युदयपूर्ण होना चाहता है।