समस्या मानव में वांछित उपलब्धि नहीं है। यही सत्यता, समाधान के लिये प्रयास और अनुसंधान है। समाधान ही स्थिति है, यही विभव है। विभव ही वैभव है। वैभव पूर्ण होने के लिए मानव चिराशित है।
विधि, व्यवस्था, संस्कृति एवं सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में निर्भ्रमता, सत्यानुभूति योग्य क्षमता के प्रति पूर्ण विश्वास, अनुभव सहित प्रमाणित होने की जिज्ञासा ही प्रतिभा समुच्चय है जो निपुणता, कुशलता और पाण्डित्य है।
तन, मन, धन रूपी अर्थ के संबंध में ही व्यवस्था है। व्यवहार एवं व्यवहारिक शिष्टता के संबंध में विधि है, जो राज्यनीति व धर्मनीति पूर्वक जीवन में चरितार्थ होती है।
मानव में स्वभाव और धर्म ही मौलिकता, मौलिकता ही मानव का अर्थ, अर्थ ही प्रकटन, प्रकटन ही स्वभाव है। मानव की मौलिकता ही मानव मूल्य है। मूल्य-सिद्धि मूल्याँकन पूर्वक होती है। मूल्य चतुष्टय ही आद्यान्त प्रकटन है। यही अभ्युदय की समग्रता है। प्रत्येक व्यक्ति अभ्युदय पूर्ण होना चाहता है। अभ्युदयकारी कार्यक्रम से सम्पन्न होने में जो अंतर्विरोध है (चारों आयामों तथा पाँचों स्थितियों में परस्पर विरोध) वही संपूर्ण समस्यायें है। इसके निराकरण का एकमात्र उपाय मानवीयतापूर्ण पद्धति से “नियम त्रय” का पालन ही है। यही पाँचों स्थितियों का दायित्व है। अमानवीयता पूर्वक “नियम त्रय” का पालन सम्भव नहीं है। अमानवीयता हीनता, दीनता और क्रूरता से मुक्त नहीं है। इसी कारणवश अपराध, प्रतिकार, द्रोह, विद्रोह, हिंसा-प्रतिहिंसा, भय-आतंक प्रसिद्ध है। ये सब मानव के लिये अवांछित घटनायें हैं। यही सत्यता मानवीयतापूर्ण जीवन के लिये बाध्यता है।
व्यवस्था विधि, नीति और पद्धति का संयुक्त रूप है। अनुभव में विधि, व्यवहार में नीति और उत्पादन-विनिमय में पद्धतियाँ प्रमाणित होती हैं। विशिष्ट ज्ञान ही विधि है जो स्थापित मूल्य एवं शिष्ट मूल्य को बोधगम्य एवं व्यवहारगम्य बनाती है। विशिष्ट बोध सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति एवं उसके विकास क्रम, उसी के आनुषंगिक दर्शन एवं अनुभव योग्य क्षमता के संदर्भ में है। अनुभव क्षमता ही समाज एवं सामाजिकता के संदर्भ में निर्विषमता तथा एकसूत्रता को स्थापित करती है। यही स्थापित मूल्य को अनुभव पूर्वक एवं शिष्ट मूल्य को व्यवहार पूर्वक सिद्ध करती है। यही विधि है।