समाज संरचना का आधार मानव मूल्य एवं स्थापित मूल्य ही है। संबंधों से अधिक समाज संरचना नहीं है। मित्र संबंध में समस्त मानव मात्र संबंधित हैं ही। अपराध विहीन समाज को पाने के लिए मानवीय शिक्षा एवं व्यवस्था पद्धति ही मूलत: कारक व आवश्यक है। मानवीय शिक्षा एवं व्यवस्था अन्योन्याश्रित उद्घाटन हैं। इनकी आधारभूत संहिता में मानव जीवन के अनुरूप जीवन के कार्यक्रम को पूर्णतया विश्लेषित करते तक अंतर्विरोध स्वाभाविक है। भ्रमित शिक्षा और व्यवस्था का अंतर्विरोध ही अराजकता है। अराजकता व्यक्ति परिवार एवं वर्ग के लिए भी वांछित घटना नहीं है। यही समीक्षा उनमें निर्विरोधिता, निर्विषमता को स्थापित करने एवं पूर्णता को प्रदान करने के लिये प्रेरणा पूर्वक प्रयास प्रक्रिया व्यवहारोदय है। मानवीय शिक्षा एवं व्यवस्था संहिता का योगफल ही मानव जीवन संहिता है, जिसमें मानव की परिभाषा, मानवीयता की व्याख्या समायी हुई है। यही जीवन संहिता की पूर्णता है। इसी के आधार पर निर्विषमता, निर्विरोधिता स्थापित होती है। ये जागृति पूर्वक, प्रमाण पूर्वक पाई जाने वाली स्थिति है।
प्रत्यक्ष रूप में स्थापित संबंध ही समाज संरचना है जिसके अनुभव में ही संपूर्ण मूल्य ज्ञातव्य हैं। ये मूल्य शुद्धत: स्थिति ही हैं। स्थिति दर्शन एवं अनुभूति हैं। संबंध विहीन इकाई नहीं हैं। प्रत्येक संबंध मूल्य सम्पन्न हैं। मानव के परस्पर संबंधों में निहित संपूर्ण मूल्यों में से नौ स्थापित मूल्यों में से पूर्ण मूल्य प्रेम है, जो मानव संबंधों में इष्ट, मंगल एवं शुभ है। यही अनुभव है जिससे ही निर्विषमता, अनन्यता मानव जीवन में प्रकट होती है। यही सामाजिकता की आत्मा प्राण और त्राण है। प्रेरणा ही प्राण, आचरण ही त्राण है।
संबंध विहीन समाज नहीं है। समाज रचना संबंध में, से, के लिए ही है। संबंध मात्र समाज में, से, के लिए है। अत: समाज एवं संबंध अन्योन्याश्रित हैं। इसी तारतम्य में सभी मूल्य अन्योन्याश्रित है। फलत: अनन्यता सिद्ध है। यही सहअस्तित्व का मूल सूत्र है।
संबंध ही जन्म, शिक्षा, व्यवहार, परिवार, उत्पादन, व्यवस्था के प्रभेद से दृष्टव्य है। वह :-
- जन्म संबंध :- माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन उनसे संबंधित सभी संबंध
- शिक्षा संबंध :- गुरु-शिष्य।
- व्यवहार संबंध :- मित्र, वरिष्ठ, कनिष्ठ (आयु के आधार पर)
- उत्पादन प्रौद्योगिकी संबंध :- साथी-सहयोगी, स्वामी-सेवक, साधन-साधक-साध्य।