तकनीकी नहीं हैं, ऐसा कुछ नहीं है। तकनीकी ही है, आदमी को आबाद करने के लिए, बरबाद करने के लिए, दोनों के लिए तकनीकी लगती है। वैसे ही धरती को आबाद करने के लिए बरबाद करने के लिए तकनीकी लगता है। उत्पादन को संपादित करने के लिए, उत्पादित वस्तुओं को बरबाद करने के लिए तकनीकी लगता ही है। अभी आप देखेते ही हो, एक dynamite लगाते हैं, building धराशायी होता है,उतने लोग मर गए, इतने लोग मर गये, हर दिन पेपरों में सुनते ही हैं। सब जगह में तकनीकी लगता ही है।
कोयले को कोड़ने के लिए भी बारूद लगता ही है। बारूदों की कहाँ जरूरत है? वोही बारूद को हम एक यंत्र को चलाने के लिए उपयोग कर लेते हैं। यदि वो बारूद से वातावरण प्रदूषित ना होता हो, मानव के लिए हितकर हो, बारूद से चलने वाली हम यंत्र को नहीं बना सकते हैं? बारूद जब कोयले को फोड़ता है, पत्थर को फोड़ता है, building को गिराता है, ये सब सुनते हैं की नहीं? आवर्तनशीलता होने के स्थिति में उसको इसमें भी उपयोग कर सकते हैं, railway engine में या और कोई बड़े-बड़े यंत्रो में, हम उपयोग कर ही सकते हैं, जैसा bulldozer वगैरह हैं, ऐसे में उपयोग कर ही सकते हैं, उसकी व्यवस्था भी हो सकती है। उस तकनीकी में कोई तकलीफ नहीं है, यदि बारूद की प्रदूषण से, ईंधन अवशेष से, यदि वातावरण बिगड़ता नहीं है और उससे कोई विपदा पैदा नहीं होता है, उस स्थिति में उसको भी उपयोग कर सकते हैं।
वो बढ़िया स्त्रोत भी है। निश्चयन करना अपना काम है, वो तकनीकी है, इसको परीक्षण, निरीक्षण पूर्वक निश्चयन करना भी तकनीकी है। वो निश्चयन करने के बारे में अभी कई चीज़ों को अपन एक सरसरी तौर पर निश्चय कर सकते हैं, जैसा प्रवाह बल को हम यंत्र के क्रियाकलाप में नियोजित कर सकते हैं। उसको प्रयोग करके सिद्ध करना तो बाकी है ही है, ऐसे प्रवाह बल की उपलब्धियों को देखने पर लगता है, ये प्रचुर मात्रा से हो सकता है, और प्रयोग सिद्ध करने के कार्यक्रम में हमको लगना ही होगा।
प्रयोग सिद्ध करते हैं, वोही तकनीकी है। उद्देश्य बन जाने से उसके योग्य तकनीकी हम उपलब्ध कर सकते हैं। हमारे जो मानसिकता है, मानव मानसिकता है, लक्ष्य को यदि पहचान लिया, ये होना चाहिए उपलब्धि, उसके लिए जो युक्तियों को खोज लेता है, वोही तकनीकी है। वैसे ही सारा यंत्र जो बने ही हैं, ऐसा कार्य करने वाले यंत्र बनाना है। एक उद्देश्य बनता है, ऐसा कार्य करने वाले यंत्र बना लेते हैं, बनाए ही हैं। इसी विधि से आगे भी हम कोई उद्देश्य पहचानते हैं, उसके योग्य यंत्रों को हम बना लेते हैं। आवश्यकता के आधार पर जो वस्तुओं को पहचान होता है, लक्ष्य पहचान होता है, उत्पादन की लक्ष्य, उस उत्पादन के लिए योग्य यंत्रों को बना लेना मनुष्य की हाथ की खेल है, ऐसा मेरा सोचना है। और यंत्र बनने के पश्चात वो कैसा उपयोग करता है वाला बात आई, अब जो है, ना सहअस्तित्व विधि से हम यंत्रों को उपयोग करेंगे।