अभी गणेशजी बताये कि रासायनिक परिवर्तन या भौतिक परिवर्तन होता है, उसे परिणती होने से ये विगत जैसा लगता है। विगत जैसा काहे को लगता है? परिणति एक भावी है, हर एक वर्तमान आगे चल कर के, कई क्रियाएं परिणत होकर के दूसरे क्रिया के रूप में ही होते हैं, कोई अभाव थोड़े ही हो जाता है। जैसा लोहा परिणत हो गया, मिट्टी हो गया, मिट्टी अपने आप में वो वर्तमान है ही है। मिट्टी परिणत हो गया, पत्थर हो गया, वो वर्तमान है ही है। पत्थर परिणत हो गया, मणि हो गया, ये वर्तमान है ही है, और मणी परिणत हो गया, धातु हो गया, ये वर्तमान है ही है। ये कभी भी समाप्त नहीं होता है, एक जगह में ठोस रूप में रहता है, दूसरे समय में विरल भी हो सकती है, ये भी वर्तमान ही है। वर्तमान कहाँ पीछे छूटा, कहाँ छूट सकता है, किसने इस बात को प्रमाणित कर सकते हैं, वस्तु तिरोभावित हो सकता है? होता ही नहीं है, परिणत होता है, ये बात सही है।
परिणामकारी वस्तुएँ भौतिक संसार में होते ही हैं, रासायनिक संसार में परिणतियाँ होते ही हैं, ये दोनों परिणामवादी हैं ही हैं, इसको ही हम भौतिक रासायनिक संसार कह रहे हैं और जड़ प्रकृति इसी को कहते हैं। परिणाम वादी, परिणामशील वस्तु को हम क्या कहते हैं? जड़ प्रकृति कहते हैं। परिणत होने के बाद भी वस्तु दूसरे स्वरूप में कार्य करता ही रहता है, कार्य मुक्ति कभी भी वस्तु का होती ही नहीं। मात्रा सहित वर्तने का काम है, वो नित्य है, वो परिणत हो या एक यथा स्थिति में हो। कई वस्तुएं यथा स्थिति में बहुत समय तक रहते हैं, बहुत सारे वस्तुएं शीघ्र परिणामी हो जाते हैं। ये दोनों चीज़ देखा जा रहा है। इसी क्रम में जीवन जो है, अपरिणामी हो जाता है। जीवन के साथ परिणाम का संबंध छूट जाता है, और गुण परिवर्तन होना भावी हो जाता है। भावी का मतलब इसके बाद, दूसरा स्वरूप में, श्रेष्ठतम स्वरूप में, वर्तने की बात आता है जीवन में।
इस ढंग से जीवन में गुणात्मक विकास की बात आती है, और भौतिक रासायनिक वस्तु में मात्रात्मक विकास- ह्रास गणना होता है। विकास- ह्रास की जो गणना है, इसी को हम कहते हैं परिणाम। परिणाम को हम काल का आधार बनाने जाते हैं, हम फँस जाते हैं। काल का कोई निश्चित स्वरूप बनता नहीं, स्वरूप ही नहीं बनता - एक। दूसरा, काल का आधार यदि सूर्योदय से सूर्योदय तक की एक काल मान लिया, किन्तु सूर्योदय से सूर्योदय होते ही रहता है, क्रिया तो निरंतर होना हमारे सामने रखा हुआ ही है, तो ये कभी समाप्त होता नहीं है। इस ढंग से हम यदि काल को यदि सूर्योदय से सूर्योदय तक की मानते हैं, उसका यदि हम खण्ड-विखण्ड करके छोटे से छोटे टुकड़े तक पहुँच जाते हैं, क्रिया को भूल जाते हैं, काल को पकड़ लेते हैं, वस्तु विहीन काल हो जाता है, वर्तमान नहीं रह जाता है। वस्तु विहीन काल को ही हम वर्तमान शून्य कहते हैं। वस्तु विहिन होता नहीं है, हमारा गणित के अनुसार संख्या के अनुसार, हम वस्तु विहीन जगह में पहुँच जाते हैं।
इस प्रकार से गणित बहुत बड़ी भारी सत्य का गणना करता है, ऐसा हमारा नहीं कहना है, गणना तो वस्तु का करता है, क्रिया का करता है। ये हमारा वांछित काल का गणना करता है। वांछित काल क्या है? किसी भी, एक दिन कहते हैं, 2 दिन कहते हैं, 10 दिन कहते हैं, 20 दिन कहते हैं, इसका गणना गणित कर सकता है, काल का गणना गणित नहीं कर सकता है। काल का जो परिकल्पना मनुष्य के पास है, वर्तमान को जब कभी भी खण्ड-विखण्ड में देखना चाहते हैं, रासायनिक परिणाम के आधार पर, भौतिक परिणाम के आधार पर अथवा दिन-रात्रि के आधार पर, हम यदि कोई काल को परिगणना करना चाहते हैं, वो क्रिया तो निरंतर रहता ही है, परिणाम होना निरंतर बना ही है। तो एक धरती, जैसा ये धरती है, ये ठोस है, तरल भी है, विरल भी है, सब चीज़ है। दूसरा धरती वैसा नहीं हैं, कालातंर