वर्तमान के महिमा को यथावत् हम स्वीकारते हुए चल सकते हैं। ये कहने का मतलब, जैसा “उदयात् उदयम् दिनम्” ये जो बताया, तो उदय से उदय तक की दिन की बात है वो निरंतर है। निरंतर उदय से उदय तक, दिन होते ही रहता है। तो एक दिन हो गया दूसरे दिन बंद हो गया ऐसा तो होता ही नहीं, तो उदय से उदय तक की दिन होने वाली बात है, वो निरंतर होते ही रहता है और उसको भूल जाने से हम भुलावा में पड़ जाते हैं। भूलने का काम आदमी ही करेगा, स्मरण रखने का काम आदमी ही करेगा, समझदारी का काम आदमी ही रखेगा, प्रमाणित करने का काम आदमी ही करेगा। इस ढंग से मनुष्य को प्रमाणित करने का कार्यकलापों के परंपरा को हम जागृति कहते हैं। जिससे आदमी समाधान पूर्वक जी पाता है। समाधान = सुख।
जय हो मंगल हो कल्याण हो!