में वो ठोस होता है। ठोस होने के समय भी वर्तमान के रेखा में ही होता है। ये नहीं है वर्तमान को छोड़ करके और कोई रास्ता पकड़ लिया और वो ठोस हो गया, ऐसा होता नहीं। ये वर्तमान अभी भी है, कल भी वर्तमान है और भी वर्तमान है, वर्तमान की निरंतरता है, उस श्रंखला में एक समय में एक धरती ठोस हो जाता है, और एक धरती विरल हो जाता है, एक धरती बर्बाद हो जाता है, एक धरती आबाद हो जाता है, ये भी हो सकता है, इसमें कोई शंका नहीं है। उसी प्रकार रासायनिक भौतिक परिणाम भी यथास्थिति से विकसित हो जाना या ह्रास हो जाना ही हम परिणाम कहते हैं। ये वर्तमान की रेखा में ही है, और परिणत हो करके वो स्वंय में अपना यथास्थिति है। वो यथास्थिति रहता ही है, कोई चीज़ समाप्त होता नहीं है, क्योंकी ये हम पा गये हैं, कि अस्तित्व ना घटता है ना बढ़ता है, इस आधार पर वर्तमान निरंतर है।
अब परिणाम से मुक्त है जीवन। जीवन के लिए तो कोई कालखण्ड बनता ही नहीं है। वो सतत् बना ही रहता है, शरीर चलाओ चाहे शरीर ना चलाओ, जीवन तो रहना ही है। जीवन में परिणतियाँ होती नहीं हैं, उसमें काल का बाधा होता नहीं। काल का बाधा नहीं होने के साथ-साथ और भी बहुत सारे चीज़ो की बाधा से मुक्त है। रासायनिक भौतिक वस्तुओं की जो पुष्टि अथवा असहयोग ये दोनों की बाधा से भी जीवन मुक्त है। तो शरीर ही एक रासायनिक भौतिक वस्तु है, इस को छोड़ करके जीवन रहता ही है। यदि ये बाधा हो जाता इसके साथ ही जीवन भी तिरोभाव हो जाना था, ऐसा कुछ होता नहीं है, या परिणत हो जाना था, ऐसा भी नहीं होता है। और जीवन जो हैं ना शरीर के साथ भी वैसे ही रहता है, शरीर के बाद भी वैसे ही रहता है। इस आधार पर जीवन की निरंतरता है ही।
यथास्थिति बना ही रहता है। उसमें गुणात्मक परिवर्तन की बात अपन शुरू किये हैं। तो जीवों में कुछ गुण प्रचलित हुई, माने प्रमाणित हुई। मनुष्य में कुछ गुण प्रमाणित हुई और गुण प्रमाणित होने की आवश्यकता, उसको हम जागृति नाम दे रहे हैं। यथा स्थिति जागृति पूर्वक हो जाए जीवन का, वो निरंतरता सुखद होगी, सुन्दर होगी, सौभाग्यमयी होगी ये हम अपना अनुभव में, परिकल्पना में जोड़ करके हम चल रहे हैं। इस ढंग से काल का यदि हम सही व्याख्या पाना चाहते हैं, वर्तमान ही निरंतर काल है।
परिणाम के आधार पर काल, रचना विरचना के आधार पर काल, दिवा-रात्रि के आधार पर काल, कुछ भी हम गणना करते हैं, वो निरंतर बने ही हैं। परिणाम भी निरंतर बना है। संगठन, विघटन भी बना ही है। वर्तमान की रेखा में वो बनती ही रहती है। उसके बाद भी वो और कार्य करता ही रहता है। परिणत हो करके भी एक यथा स्थिति में आता है। अभी एक यथा स्थिति है, परिणत हो करके दूसरा यथा स्थिति में रहता ही है। जैसा शिशुकाल में बच्चे बहुत छोटे दिखते हैं, अपने यथास्थिति दिखता ही है। वो थोड़े दिन के बाद लम्बाई-चैड़ाई बदल जाता है, उसका यथा स्थिति भी बना ही रहती है। उसके बाद पता लगता है जितना तन्दरूस्त होना है, हो ही जाते हैं, उसके बाद धीरे-धीरे वृद्धापे की ओर चले जाता है, वो भी यथा-स्थिति समझ में आता ही है। उसके बाद मरने के पहले भी एक यथा स्थिति बना रहता है। शरीर छोड़ने के बाद भी शरीर की यथा स्थिति दिखती ही है, उसके बाद जलाने के बाद, या गाड़ने के बाद, सड़ने के बाद, धरती में खाद गोबर होने के बाद, भी उसकी यथा स्थिति बना ही है। यथा स्थिति बना नहीं है, आप हमारे पास कोई ऐसा गवाही नहीं है। हर परिणााम की एक यथास्थिति बनी रहती है। वो status अपने में एक स्थिति है, ये वर्तमान में ही है। इस ढंग से हम वर्तमान की निरंतरता को अच्छी ढंग से भले प्रकार से हम स्वीकार सकते हैं। वर्तमान में कुछ कारणों से कुछ क्रियाओं को देख कर, हम समय को एक छोटे-छोटे टुकड़े में भी पहचान करके