में सत्यता आता नहीं। आँखों में जितना दिखता है, उसके अनुसार निष्कर्ष निकालते हैं, on the whole कैसा निकालोगे तुम? आपको आँख से जैसा दिखा, वैसा निष्कर्ष निकाल लिया, निकालो।
प्रश्न : परमाणु को देखने जाते है, तो परिवेश के चारों तरफ एक निश्चित दूरी तक, उस अंशों का होना पाया जाता है, तो हम परिवेश तो देख पाते हैं, पहला परिवेश, दूसरा परिवेश, तीसरा परिवेश देख पाते हैं। लेकिन वो परिवेश एक बिल्कुल line में है, ऐसा दिखता नहीं, बल्कि धुँधला दिखता है, एक दूरी है हर परिवेश के साथ, जिसमें वो अंश दिखाई पड़ते हैं, ये देखा गया। इसके आधार पर जो उन्होंने प्रतिपादन किया, वो ये है कि इसका जो होना है, अंश का उस परिवेश में, इसको निश्चयता पूर्वक नहीं कहा जा सकता। एक uncertainty का amount है, एक uncertainty है, अनिश्चयता है, उस परिवेश में होने के लिए, कि उस परिवेश से वो थोड़ा हटा हुआ होता है, ये कितना हटा हुआ होगा, वो इस पर निर्भर करता है कि हम उसको बाहर से देखने के क्रम में कितनी ऊर्जा दे रहे हैं, कितना disturb कर रहे हैं। तो यहाँ से ये बात उन्होंने शुरू की, कि हम उसके होने का निश्चय पूर्वक नहीं कह सकते, की वो उस परिवेश में इसी क्षण में कहाँ पर है। इतना तो हम बता सकते हैं, कि इस परिवेश के आस-पास इस संभावनाओं के साथ होगा। इतना जो है, प्रतिपादन है वो।
उत्तर : ये प्रतिपादन अच्छा है, नासमझी का। उतना जोड़ देने पर ये ठीक पूरा हो जाता है।
प्रश्न : इसमें जोड़ना ये होगा, मेरे हिसाब से, गलती यहाँ पर नहीं है, गलती इस बात पर है कि इसके आधार पर ये निष्कर्ष निकालना कि जो ये अनिश्चयता यहाँ पर दिख रही है, उसके ठीक-ठीक स्थान निश्चित करने में, वही अनिश्चितता पूरे अस्तित्व में है। ये जो निष्कर्ष निकालते हैं।
उत्तर : एक स्थान में होने पर गति कहाँ हुआ?
प्रश्न : गति + परस्परता का प्रभाव, उसके फलस्वरूप इतनी अनिश्चितता दिखती है।
उत्तर : और एक factor उसमें जोड़िए, हमने जो उसको disturb किया है वो factor।
प्रश्न : उसको तो count कर रहे हैं वो लोग। problem जो है वो ये है कि हम उसको generalize करने जाते हैं, कि जैसा ये अनिश्चयता उस छोटे से स्थान पर दिख रही है, वही अनिश्चितता पूरे अस्तित्व में है?
उत्तर : हाँ, ऐसा सोचने गए, सबसे नुकसान वो ही हुआ। इसमें हमारा कहना ये है नासमझी हम कैसा करते हैं। पहला मुद्दा ये है, आँखों में किसी सम्पूर्णता समाता नहीं। दूसरा किसी वस्तु को हम अँगुली किए बिना हम पहचानते ही नहीं हैं। अपने स्वरूप से विचलित किए बिना, परेशान किए बिना हम किसी वस्तु को मूल वस्तु को देखना जानते ही नहीं हैं। तीसरा factor ये है गति और स्थिति, अविभाज्यता के साथ सर्वाधिक गति को प्रदर्शित करता हुआ, परमाणु का परिवेशीय अंशों का गति को, एक जगह में आप पाने के लिए कैसा कल्पना करते हैं?
ये 3 factor इसके साथ जुड़ता है।