उत्तर : झाड़ पौधे जैसा ही है। ठीक है। पत्थर जो है ना अपना भोजन नहीं बनाता है, ये अपना भोजन बना लेते हैं, ठीक है, मान लिया। ठीक, तो कहना है, ये प्राणकोशायें जो है, ये मूलतः एक प्रजाति की होती हैं। उसमें प्राणसूत्र होता है, रचना विधि होती है, उस-उस प्रजाति की बीज में उस रचना विधि सहित कोशायें होते हैं, उसके अनुकूल परिस्थिति में जो जितने भी रसायन द्रव्यों को चाहिए, वो सम्प्राप्ति होने के पश्चात, वो प्राणसूत्र अनेक कोशाओं में अपने को बदलता चला जाता है, बढ़ाता चला जाता है। इसको प्रजनन क्रिया माना जाता है, एक प्रकार से।या multiplication। प्राणसूत्र में रचना विधि निहित रहती है, कोशा में प्राणसूत्र निहित रहता है। हर प्राणकोशा में।
प्रश्न : बीज की स्थिति में क्या होता है?
उत्तर : बीजा की स्थिति होता है तो क्या होता है? बीजा में प्राणसूत्र और रचना विधि सम्पन्न दो बहुत अच्छी जो वस्तु है, एक बीजा के पूर्व रूप, स्तुषि नाम की एक आकार रहता है। कोई भी बीजा को फोड़ कर के देखा जाए उसके अंदर वो जो पेड़ का एक बहुत सूक्ष्म, सूक्ष्मतम स्वरूप बन करके रखा रहता है, ठीक है? उस स्वरूप में वो प्राणकोशायें वो सूख कर के बने रहते हैं, बीजों में। सूखे हुए अवस्था में रहते हैं। वो जिसको अभी फ्रिज में, उसमें इसमें रखना चाहते हैं, एक वर्ष, वो बीजा में हर स्तुषि सुरक्षित रहता है। इस वर्ष का बीजा, आगे वर्ष तक बिल्कुल कामयाब है। हम लोग डालते ही हैं, वो बीजा उगता ही है और उसमें से किसी percentage नहीं भी उगता है। माने 100 बीजा डालने पर 2-4 कम भी उगता होगा। तो ये बात हमने लोगों ने देखा है। ठीक है।
प्रश्न : स्तुषि में और प्राणकोशा में क्या अंतर है?
उत्तर : स्तुषि का स्वरूप जो है ना, झाड़ को छोटा, छोटा करते-करते, उसका सुई के नोक के बराबर या छोटा स्वरूप बनाने पर जो होता है, उसमें वो प्राणकोशा सूख कर के बैठा रहता है।
प्रश्न : स्तुषि जो होती है, वो तो आँखों से दिखती है, मूंगफली का, चने का।
उत्तर : हर बीज मे रहता है।
प्रश्न : वो काफी बड़ा होता है। बाबाजी स्तुषि में एक ही प्राणकोषा होती हैं, या कई प्राणकोशा..?
उत्तर : तो उसमे क्या रहता है, एक से अधिक प्राणकोशा रहता है। माने वहाँ भी safety measurement है। तो कई 10-10, 5-5, 20-20 कोशाओं से वो स्तुषि बना रहता है, वो सूख कर के वहाँ बैठा रहता है। वो रासायनिक द्रव्यों को पा कर के, वो अपने जैसा प्रतिरूप बनाना शुरू करता है। प्रतिरूप बनाना शुरू करने के बाद वो इतना speed से बनाता है, जितना स्पीड से वो झाड़ बढ़ना है, उस speed से उसमे बनना शुरू कर देता है। पहले वो जहाँ स्तुषि रहती है, वहीं पहले एक को चार, दस बनता है, उसके बाद अंकुर होने की बाद उसका तने मे वो multiply होता है, प्रतिरूप बनना शुरू कर देता है। ऐसा व्यवस्था है। अभी जितने भी झाड़ है, उसका जो कोषाओं का प्रतिरूप बनता है, वो तने में बनाता है। सारदार, रसदार वो तने में ये प्रतिरूप बनाता रहता है, ऐसा है काम। पुनः बीज बनता है, बीजों में पुनः निहित होते हैं। इसका नाम है, “बीज वृक्ष न्याय”। ठीक है, ये ऐसा बनेगी महराज, हर बीजा की गति यही है।