प्रश्न : बाबा वो प्रश्न छूटा रह गया कि पेड़-पौधे मे जीवन होता है?
उत्तर : पेड़-पौधे मे जीवन नहीं है। साँस लेने की साँस छोड़ने की प्रक्रिया है, जीवन नहीं है। ये साँस लेना, साँस छोड़ने का काम प्राणकोशाओं का है। शरीर में भी साँस छोड़ना, साँस लेने की प्रक्रिया होती है, शरीर जीवन नहीं है। इतना बड़ी भारी बात बैठा रहती है। शरीर जीवन नहीं है।
प्रश्न -बाबाजी एक प्रयोग किया गया है, कि छोटे-छोटे पौधे लिए गए, एक पौधे के पास एक दुखी आदमी, या क्रोधित आदमी जाता रहा, तो उसके वृद्धि में दूसरा प्रकार का लक्षण देखा गया, कम वृद्धि हुआ, उतना ही खाद, उतना ही पानी एक व्यक्ति प्रसन्न हो कर दूसरे पौधे को दिया है, तो उसकी वृद्धि कुछ ज्यादा हुई, इस आधार ये माना गया है कि मनुष्य के भावों का प्रभाव पड़ता है। ये जो बात करने वाली बात हम कर रहे थे।
उत्तर : हाँ ठीक है, इस प्रकार से कथाओं को बहुत सारे बात कहा गया है, तो उसको जो हमारे मनोभाव से झाड़ों को व्याख्यायित करना, अभी हम ही, हम बोलते रहे, 2 प्राणकोशायें कितने प्यार से एक दूसरे को समझते हैं, एक बैठा रहता है उसके बगल से वो कैसा बैठने के लिए चले जाता है, प्यार से, वो प्यार थोड़े ही वहाँ रहता है। उसका एक नियति है, उसको वही करना है, दूसरा कुछ कर ही नहीं सकता। ठीक है। ये जो है ना, कथा बनाना, कविता बनाना मनुष्य का एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
तो प्राणकोशाओं से जीवन से बहुत दूर संबंध है। प्राणकोशायें रासायन द्रव्य से बनी हुई वस्तु है, इसका मृत्यु होती है। इसका मृत्यु का मतलब, ये परिणत हो जाता है, और होने में श्वास लेते हुए में भी देखा जा सकता है, श्वास लेने की असमर्थ स्थिति में भी देखा जाता है, जिसको मृत कोशा कहलाता है। ठीक हो गया, इस ढंग के रहते हैं ये। तो उसके बाद, मृत कोषा के बारे में आते है, जैसा बीज भी कहते हैं। उसके अंदर जो कोशाएं रहते हैं, सूख कर के रहते हैं, सूखा हुआ स्थिति में वो कोशाएं रहते हुए, रसायन द्रव्यों को पाकर पुनः वो श्वास लेने योग्य हो जाते हैं।
प्रश्न : मतलब बीज में कोशा श्वसन नहीं करती हैं?
उत्तर : कितना बढ़ियाँ चीज़ है। वो अभी आप fridge करने की बताते रहे ना, system वही है, नाइट्रोजन के अंदर रखते है, इनके अंदर भी वही वस्तु रहता है, एक वर्ष तक वो preserve करता है। वो नाइट्रोजन को आपको कहीं न कहीं से लाना पड़ता है, इसमें कुछ नहीं है। उसी प्रकार से अभी कृत्रिम गाय, भैंस के गर्भाधान कराने की जो प्रक्रिया करते हैं, उसके साथ भी वैसे ही कुछ रहता है, (नाइट्रोजन में रखते हैं) हाँ बस।
प्रश्न : वो कितना ठीक है, बाबाजी?
उत्तर : वो कोई खास परेशानी नहीं है। यदि सफलता से उस तकनीकी को सम्पन्न कर सके, उसमें तकलीफ नहीं है। उसमें क्या देखा हमारे यहाँ गायों के साथ, उस प्रकार की प्रक्रिया करा करके देखा गया। 3, 3 बार fail हो गया। उसके बाद उसके विशेषज्ञ हैं, उनको बुलाया गए, दिखाये गए, तो वो कहते हैं वो गलत हो गया, वो जो technician है वो सही नहीं है, नहीं तो material सही नहीं है, ऐसा कहके चले जाते हैं। अब किसको पकड़ें हम।