देगा। डाँटेगा, डपटेगा, ये होगा वो होगा, स्वयं परेशान रहेगा, दूसरों को परेशान करेगा। वो तो सिद्धांत ही होता है -“जो जिसके पास रहता है, उसी को आवंटित किया करता है” उस आधार पर मनुष्य को भय से मुक्त होना बहुत आवश्यक है। एक आवश्यकता। समस्या भी एक पीड़ा है, समस्या को समाधान से तृप्त करने की आवश्यकता। समाधानित रहने से, भय से मुक्त रहने से आदमी सभी कार्य को सऊर से करता है। समाधानित रहने से मनुष्य, मनुष्य के साथ जितने भी, परिस्थितियाँ आता है, उसका जवाब हो जाता है, एक दूसरे की संतुष्टि मिलने की तरीका निकलती है और प्रसन्न होने की दिन आती है, एक क्षण आती है।
इसीलिए समाधान एक बहुत ही मूलभूत आवश्यकता है, और अभयता एक मूलभूत आवश्यकता है, भयमुक्ति एक आवश्यकता है। ये दोनों होने के बाद हम समृद्धि के पास जाते हैं। ये तीनों मिलने के पश्चात सहअस्तित्व प्रमाणित होता है। इस ढंग की, मानव का जो कुछ भी झाँकी बसी हुई है, सजी हुई है, प्राकृतिक, नैसर्गिक विधि से, वो इसी-इसी को सदा-सदा बताता है। इसको मनुष्य पहचानने की व्यवस्था है। मनुष्य पहचान करके प्रमाणित करने की व्यवस्था है। पहचानने जाता है तो समझदार होता है, क्या बात है! जैसा- एक परमाणु, दूसरे परमाणु को पहचानता है, वो एक अणु के रूप में रचना हो जाता है, एक अणु दूसरे अणु को पहचानने से अणु रचित रचनाएँ हो जाते हैं। एक कोशाएँ दूसरा कोशा को पहचानने पर एक कोशाओं से रचित रचनाएँ विविध प्रकार से हो ही जाते हैं, और एक ईटां दूसरे ईटां को पहचानने की विधि से दीवाल सीधा हो जाता है। इसी प्रकार हर एक रचनाएँ एक दूसरे को पहचानने की क्रम में रखी हुई है। हर रचना, हर सही रचना, हर सार्थक रचना कुल मिलाकर के एक दूसरे को पहचानने के क्रम में रखा हुआ है। इस ढंग से बना ।
उसी में, मनुष्य भी उसी में आता है, एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को पहचानने के क्रम में ही सही, गलती होती है। ठीक हो गए पूरा। चाहते क्या हैं पूछा तो, सही चाहते हैं। सही चाहना हो तो सऊर से पहचाना जाए। क्या सऊर से पहचानोगे भाई? तो मनुष्य तो, हर मनुष्य है ना समाधान चाहता है, इसलिए समाधान से जुड़ा जाए, हर मनुष्य भयभीती से मुक्ति चाहता है, अभयता से जुड़ा जाए, हर व्यक्ति समृद्धि को प्यार करता है, स्वीकारता है, इसीलिए समृद्धि से जुड़ा जाए, इसी अस्तित्व सहज रूप में ही हम सहअस्तित्व में हैं, इसलिए सहअस्तित्व से जुड़ा जाए। जोड़ने की 4 तरीका हुई, 4 आयाम हुई। आप हम मंगल मैत्री, समाधान पाने का और सुखी होने का 4 आयाम हुई। सहअस्तित्व विधि से हम सुखी हो सकते हैं, अभयता विधि से सुख की संभावना बन जाती है, समृद्धि विधि से सुख की संभावना आती है, समाधान विधि से सुख की संभावना आता है। सुख की संभावना का 4 dimension अपने आप से रखा हुआ है। इसको प्रयोग करना है नहीं करना है, उसको decide करना है। ये तो व्यक्ति ही करेगा। प्रयोग करना है, तो समझदार होगा ही, नहीं प्रयोग करना है, तो समझदार होगा नहीं। ठीक है। समझना वस्तु की ही होगा। समाधान वस्तु के रूप में क्या चीज है। अभय, अर्थात भय से मुक्ति, वास्तविक रूप में है क्या चीज, वस्तु के रूप में? वस्तु के रूप में जाते हो तो “विश्वास”। विश्वास का धारक वाहक आदमी। वस्तु के रूप में, गति के रूप में विश्वास है ये। अभयता का जो सकारात्मक भाषा है, वो विश्वास है। सदा-सदा वर्तमान में विश्वास रखना ही, मनुष्य का भय से मुक्ति का प्रमाण है। और मनुष्य, मनुष्य से भयभीत होकर के मिलने की जगह में विश्वास पूर्वक मिलता है, सुख की संभावना, समाधान की संभावना बनता है कि नहीं बनता है? तो भयभीत होकर के एक दूसरे से मिलने से कहाँ संभावना बनता है, सुख की संभावना तो करोड़ों मील दूर भागाता है। तो मनुष्य को परस्पर मिलने के लिए