विश्वास चाहिए, परस्पर मिलने के लिए साथ-साथ होने का अरमान चाहिए, सहअस्तित्व चाहिए। मनुष्य से मनुष्य मिलकर जीने के लिए समृद्धि चाहिए और समाधान निरंतर चाहिए। ये 4 चीज़ को अपने में संजो के रखने के लिए मूल मंत्र है समझदारी। समझदारी आने के बाद जो ईमानदारी, समझदारी के साथ ईमानदारी वर्तता है, ये चीजें आने लगती हैं। उसके साथ जिम्मेदारी होने से और प्रमाणित होने के पास में होते हैं, भागीदारी कर देने पर प्रमाणित हो ही जाते हैं। इस विधि से हम अपना पहचान, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक अस्तित्व में प्रस्तुत करना सफल हो जाता है।
Table of contents
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इस संकलन के बारे
1
1. मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद
9
2. मानव केंद्रित चिंतन
12
3. जीवन की शक्ति व बल
26
4. अनुभव व जागृति
36
5. दर्शन, वाद और शास्त्र
40
6. मानव शरीर रचना
43
7. मानव शरीर गुण और नस्लें
46
8. जीवन और शरीर का सम्बंध
53
9. मध्यस्थ मार्ग और दर्शन
54
10. आहार विहार
57
11. ज्ञानवाही और क्रियावाही तंत्र
58
12. कामनाओं का विश्लेषण
65
13. अखण्ड समाज व्यवस्था
67
14. परमाणु – 1
78
15. परमाणु - 2 (आचरण)
82
16. परमाणु - 3 (मध्यस्थ बल व प्रजाति)
86
17. परमाणु - 4 (अंश और जीवन परमाणु)
95
18. परमाणु में गति
101
19. पर्यावरण संतुलन
104
20. विकास क्रम - पदार्थावस्था से ज्ञानावस्था
109
21. जागृति क्रम
113
22. शिक्षा संस्कार योजना
116
23. स्वावलम्बन
119
24. भाषा
122
25. गणित
127
26. उत्पादन कार्य योजना
129
27. विज्ञान
134
28. विवेक
137
29. समय, काल, वर्तमान
141
30. तकनीकी का प्रयोग
143
31. कला और तकनीकी
146
32. प्रबंधन
147
33. विनिमय कोष और श्रम मूल्य
150
34. न्याय, संविधान और संप्रभुता
152
35. स्वास्थ्य संयम
154
36. स्थिति, गति और बल
155
37. सापेक्षतावाद और अनिश्चयवाद
161
38. वनस्पतियों में जीवन और प्राण कोशा
164
39. समाधान और भय मुक्ति
167
40. कम्पन तरंग से ज्ञानोदय
173
41. विचारों का स्थान और प्रभाव
177
42. अनुभव - जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना
180
43. बोध साक्षात्कार
185
44. अंतर मुखी एवं बहिर्मुखी - 1
188
45. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 2
192
46. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 3
198
47. अध्ययन के तीन चरण
200
48. समापन