उत्तर : उसके लिए हमने जो पहचाना महाराजजी, व्यवस्था में होना एक खुशहाली है, क्योंकि मनुष्य संवेदनशील संज्ञानशील हैं ही है, तो इसको यदि invest करता है, इसको दाव लगाता है, उस स्थिति में हमको ये पता लगता है की परमाणुऐं व्यवस्था में कितना खुश हैं, ये हमको पता लगता है। तो यही अंश परमाणु के रूप में, परमाणु अणु के रूप में हो करके भौतिक, रासायनिक क्रियाकलापों को जो संपादित कर रहे हैं - झाड़ के रूप में, पौधे के रूप में, फूल के रूप में, बीज के रूप में, तने के रूप में, और रूप में, जड़ के रूप में, सभी रूप में जो व्यक्त रहे हैं - इन सभी में कार्यरत जो अणु हैं, अपने खुशहाली के साथ ही वो रचना को पूरा किया है। वो सारे अणुएँ, जो प्राणाणु हैं, वो मृतक हो करके उस अवशेष को यथावत बना कर रखते हैं। क्या बात है ये!
अवशेष, जो परमाणुऐं इसे प्राणकोषाओं के रूप में बहुत सारे रचनाओं को करने के बाद, जब वो झाड़ मर जाता है, वो सारे प्राणकोशाएँ मृतक हो करके उसी में समाये रहते हैं। क्या बात है! वो अवशेष रहता है, वो स्वयं में कितने बड़ी-भारी मानव के लिए उपयोगिता के रूप में दिखा, कितना बड़ी-भारी उपयोग किया आदमी ने, ये भी नहीं उपयोग नहीं किया ये भी नहीं है। जो जीवित रहते समय मे खुशहाली और वो झाड़ मरने के बाद भी मानव के या धरती के खुशहाली का साधन। धरती के लिए जब साधन होता है उर्वरक रूप में परिवर्तित हो जाता है। मानव के साथ साधन के रूप में आता है, दरवाजा, कुर्सी, बेंच हो करके, ये खुशहाली का आधार बनता है। इसको हमने देखा है, हर व्यक्ति देखा है। माने अवशेष भी खुशहाली का साधन है, ये मेरा यहाँ कहने का मतलब है, और झाड़, पौधे, तो अपना खुशहाली को व्यक्त करता ही है।
हर दिन नवीनतम् विन्यास, हर दिन नवीनतम मूद्रा, हर दिन नवीनतम भंगिमा, ये सब को कैसा पैदा करता है, खुशहाली के बिना कैसे पैदा करोगे? आप हम क्या पैदा करेगें? आप हम यदि खुशहाली का मुद्रा, भंगिमा, अंगहार को व्यक्त करना है, हर दिन नित्य नवीन करना है, हम अपने में कितना खुशहाली को व्यक्त करना होगा? आप एक बार सोच के देखो। हम करते ही हैं, अभिव्यक्त करने के क्रम में हम खुशहाली को ही अभिव्यक्त करते हैं। संकट को हम अभिव्यक्त करना भी नहीं चाहते हैं। हमारे में भी ये समाई हुई है। आपके सम्मुख कोई संकट को गाना की इच्छा रखने वाला कम हैं। संकट को गाने वाले कम हैं और खुशहाली को व्यक्त करने वाले अधिक आपको मिलते रहते हैं। हम को भी वैसे ही मिले हैं। आपको भी वैसे ही मिलेंगें। इसको क्या व्याख्या करोगे? अस्तित्व में खुशहाली का बहार है या मातम का बहार है?
क्या कहेंगे ? यदि खुशहाली का बहार है तो हम प्रत्येक अणु में भी उसका नृत्य को देखना चाहेगें। उसी क्रम में हमने अभी आपको इंगित कराया, ये परमाणु अंशों का जो एक नृत्य विधि से ही ये कम्पनात्मक गति आता जाता है। ये कम्पनात्मक गति होता काय के लिए है? कहा -ये जीवन परमाणु में अन्ततोगत्वा कम्पनात्मक गति ही वर्चस्वी हो जाता है, वर्तुलात्मक गति से अधिक वर्चस्वी हो जाता है। वहाँ तक पहुँचने के क्रम में बीज रूप है ये। ऐसा मुझको समझ में आता है।
प्रश्न : क्या जीवन परमाणु में कम्पनात्मक गति बढ़ने का जो कारण है, अंशों की संख्या का अधिक होना और तृप्त होना और केन्द्र में एक अंश होना?