जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का दर्शन एवं व्यापक सत्ता में अनुभव ज्ञानपूर्वक समाधान है, जिसका प्रत्यक्ष रूप व्यवहारात्मक जनवाद एवं समाधानात्मक भौतिकवाद है।
सत्ता में अनुभव ही पूर्ण विकास और जागृति है, जिसका प्रत्यक्ष रूप दया, कृपा एवं करुणा का प्रकटन है। यही चारों आयामों की एकसूत्रता, पूर्ण उपलब्धि, विकास एवं जागृति सफलता कृतकृत्यता, सतर्कता एवं सजगता है, साथ ही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का अभीष्ट भी।
ज्ञानावस्था के पूर्ण जागृत मानव में आप्त कामना, श्रेय कर्म; जागृत मानव में शुभेच्छा एवं कर्म; अर्ध जागृत मानव में मंगल कामना एवं संयत कर्म व उपयोग; राक्षस व पशु मानव में शुभ कल्पना, अशुभ कर्म एवं असंयत भोग प्रवृत्तियाँ पायी जाती है। ये वैविध्यताएं ही एकसूत्रता, सामंजस्यता पूर्वक सहअस्तित्व को पाने के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी है। सहअस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए जागृति ही एक मात्र प्रेरणा स्त्रोत है। सम्पूर्ण प्रयास व्यवहारात्मक जनवाद, समाधानात्मक भौतिकवाद तथा अनुभवात्मक अध्यात्मवाद के परिप्रेक्ष्य अथवा आवश्यकता से है, क्योंकि जनाकाँक्षा को मानव जाति व्यवहार रूप में पाना चाहती है एवं भौतिक सम्पदा तथा साधनों को परस्पर मानव के कलह का कारण नहीं बनाना चाहती, अपितु इसके विकल्प में उसका निराकरण एवं व्यापक सत्ता में अनुभव करना चाहती है, जो स्पष्ट है।
आशा व प्रत्याशा के विपरीत कर्म व भोग प्रवृत्ति ही प्रत्येक स्तर में अन्तर्विरोध का कारण है।
आशा व प्रत्याशा में समाधान रूप में शुभ होना पाया जाता है, उसके अनुरूप कर्म और उपयोग में दक्षता व पात्रता का अभाव ही पराभव या असफलता का कारण है। यही पुन:प्रयासोदय है। यह क्रम तब तक रहेगा जब तक स्वस्थ व्यवस्था एवं शिक्षा से मानव सम्पन्न न हो जाए। अत: मानव द्वारा “वादत्रय” को सफल बनाने के लिए स्पष्ट एवं पूर्णतया मानव की परिभाषा, मानवीयता की व्याख्या, सामाजिक अनिवार्यता, समाज की परिभाषा, समाज का आधार, समाज का लक्ष्य, समाज का आचरण, सामाजिकता का अध्ययन, समाज की अक्षुण्णता के लिए प्राकृतिक एवं वैयक्तिक ऐश्वर्य के सदुपयोग एवं सुरक्षा का अध्ययनपूर्वक व्यवहारान्वयन आवश्यक है।
वर्ग निर्माण पद्धति, नीति, व्यवहार, उपदेश, शिक्षा एवं व्यवस्था, वर्ग विहीन अखण्ड समाज को स्थापित करने में असमर्थ रहा है।