कर्माभ्यास अन्वेषण, शिक्षण, प्रशिक्षण है, जिसकी चरितार्थता उत्पादन है, फलत: समृद्धि है।
व्यवहाराभ्यास अनुसंधान, अनुसरण, आचरण, संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था है, जिसकी चरितार्थता सामाजिकता, अखण्डता, निर्विषमता, अभयता, समाधान, संतुलन एवं स्वर्ग है।
मानव का अशेष कार्यक्रम वैचारिक, व्यवहारिक एवं उत्पादन है, वैचारिक परिपूर्णता अथवा समाधान के लिए साक्षात्कार एवं चिंतनाभ्यास आवश्यक है ही। साक्षात्कार एवं चिंतनाभ्यास पूर्वक ही यर्थाथता, वास्तविकता, सत्यता को निरीक्षण-परीक्षण कर पाना सहज है। यही समाधान रूपी निष्कर्षों को स्फुरित करता रहता है। जिससे ही सर्वशुभ है। जो पाँचों स्थितियों में “नीतित्रय” से संबद्ध है।
“अनुभव कार्यक्रम नहीं है। अपितु अनुभव में, से, के लिए ही कार्यक्रम है।” नीतित्रय अन्योन्याश्रित है।
अर्थ के बिना धर्मनीति एवं राजनीति, सदुपयोग तथा सुरक्षा के बिना अर्थ की चरितार्थता सिद्ध नहीं है।
मानव अर्थ विहीन नहीं है। प्रत्येक मानव में जन्म से तन-मन की अवस्थिति दृष्टव्य है। तन व मन के योगफल में ही धन का उत्पादन निर्माण, उपयोग, सदुपयोग एवं वितरण प्रत्यक्ष है।
अर्थ के सदुपयोग व सुरक्षा की अनिवार्यता को सिद्ध करता है, जो मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। यही “ नीतित्रय ” की अनन्यता है, समस्त मानव की एकता के लिए आधार भी है। यह आधार अपरिवर्तनीय एवं शाश्वत है। साथ ही परस्परता में अनन्यता को पाने का स्रोत भी है। यही समाधान चक्र है। इसी समाधान के लिए अनादि काल से मानव तृषित एवं प्रत्याशी है।