मानवीयता पूर्वक ही सामाजिकता प्रमाण पूर्वक सिद्ध होती है। अमानवीयता की सीमा में सामाजिकता की संभावना नहीं है। अतिमानवीयता में मानवीयता समर्पित रहती ही है। अत: सामाजिकता की संपूर्ण अभिव्यक्ति मानवीयता और अतिमानवीयता ही है क्योंकि सामाजिकता और किसी प्रकार सिद्ध नहीं होती है। अत: इसी नियति क्रम या विकास क्रम, विकास एवं जागृति क्रम, जागृति तथ्यवश ही मानव मानवीयता का अनुसरण व आचरण करने के लिए बाध्य है।
अमानवीयता में कितने भी प्रयोग करें अथवा वर्गवादी प्रयोग करें, अन्ततोगत्वा मानवीय स्वभाव, धर्म, दृष्टियों के प्रति समर्पित होना अवश्यंभावी है क्योंकि विश्राम के लिए इसके अतिरिक्त और कोई शरण नहीं है।
मानव पाँच स्थितियों में गण्य है, जो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और अन्तर्राष्ट्र के रूप में स्पष्ट है।
समाज का मूल रूप प्रत्येक मानव में समझदारी के रूप में समाया है, जो विचार, आशा, आकाँक्षा एवं मंगल कामना के रूप में है।
स्थितिवत्ता की मूल्य दर्शन क्रिया ही अध्ययन है। यथार्थ मूल्य दर्शन क्षमता ज्ञानानुभव ही है।
मूल्य दर्शन क्षमता ही प्रमाणवत्ता को प्रगट करती है प्रमाण केवल प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव ही है।
संबंध विहीन जन्म एवं मूल्य विहीन संबंध नहीं है। सम्पूर्ण मानव के साथ स्थापित संबंध समान हैं। उनमें स्थापित मूल्य भी समान है। यही संबंध व मूल्य ध्रुव है। इसका निर्वाह ही न्याय है। यही न्याय ध्रुव है। मानव में न्याय की याचना, कामना एवं सम्मति जन्म से ही है। यही शाश्वत मूल्य समाज का मूल आधार है। इसी आधार पर “नीतित्रय” सुदृढ़ है।
संबंधों में स्थापित मूल्य का निर्वाह ही धर्म है, जिसमें अर्थ के सदुपयोग का स्वभावत: संबंध रहता ही है।
धर्म ही “सुख” है। अर्थ के सदुपयोग व सुरक्षा के बिना सुखानुभव सिद्ध नहीं होता, जो प्रत्यक्ष है।