सत्यतावश मानव संचेतनशीलता की मौलिकता को अनुसरण करने के लिए विवश है। वास्तविकता एवं समझने का अवसर, संभावना एवं क्षमता मानव में किसी न किसी अंश में पायी जाती है, जो स्पष्ट है।
यांत्रिक प्रक्रिया में आस्वादन, संचेतनशील क्रिया में स्वागत पद्धति स्थापित पायी जाती है।
अनुमान क्षमता ही प्रत्यक्ष रूप में स्वागत पद्धति, वास्तविकता एवं अनिवार्यता है।
सामान्यत: अनुमान ही भास, आभास एवं प्रतीति के रूप में साम्यत: पाया जाता है। यही अधिकार, अवसर, उपयोगिता, उपादेयता तथा अनिवार्यता वश ही “प्रमाण त्रय” के रूप में सिद्ध होता है। इसकी शिक्षा व व्यवस्था पूर्वक सामान्यीकरण होता है, जो प्रसिद्ध है।
मानव अखण्ड सामाजिकता को पाने के लिए जड़ चैतन्य प्रकृति में निहित मूल्यों को पूर्णतया श्रवण, अध्ययन, अवगाहन, मनन, चिन्तन एवं अनुभव पूर्वक व्यवहार एवं उत्पादन में लाने के लिए प्रेरित है। इसका निर्वाह ही जीवन में सफलता, उपलब्धि, समृद्धि एवं समाधान है।
बाध्यता या अनिवार्यता से विमुख होना ही पराभव या असफलता है। अनिवार्यता ही वास्तविकता, वस्तुस्थिति सत्यता, व्यवस्था, जागृति, सहजता एवं अनिवार्यता है।
मानव में पायी जाने वाली अतिमानवीयता समाधान एवं अखण्डता के रूप में, मानवीयता एकसूत्रता व समन्वयता के रूप में तथा अमानवीयता परस्पर वैविध्यता व विरोध के रूप में दृष्टव्य है। जागृत मानव स्वभाव इष्ट प्रवृत्ति, वृत्ति तथा निवृत्ति, शिक्षा तथा व्यवस्था, प्रबुद्धता व अनुसंधान इन सबका क्रमश: “तात्रय” के लक्ष्य पर आधारित होना पाया जाता है।
प्रवृत्तियाँ भोगों के उपलक्ष्य में, वृत्तियाँ सामाजिकता की सीमा में एवं निवृत्तियाँ अनुभव में व्यस्त, व्यवस्थित एवं ओत-प्रोत पायी जाती है। अवधारणा में ही सामाजिकता व उद्घाटन है।
अनुभव केवल वस्तुस्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य एवं स्थितिपूर्ण सत्य ही है।
अनुभूति ही मानव का आद्यान्त लक्ष्य है। यही जागृति बाध्यता तथा अनिवार्यता को प्रसवित करता है। इसलिए व्यवस्था, प्रक्रिया, पद्धति, प्रणाली एवं नीति के अनुसंधान एवं अनुसरण के लिए संकल्प, इच्छा, विचार व आशा का प्रवर्तन है; फलत: उत्पादन, व्यवहार तथा अनुभूति की चरितार्थता है।