पूर्ण विकसित इकाई के द्वारा अविकसित के पूर्ण विकास के लिए की गयी प्रेरणा सहित सहायता ही आप्त कामना है।
स्वयं की जागृतिशीलता में विश्वास व निष्ठा रहते हुए अविकसित के विकास के लिए सहानुभूति की निरंतरता ही शुभेच्छा है। स्वयं समृद्ध एवं समाधान पूर्वक कम विकसित के समाधान व समृद्धि के लिए किया गया सहकार्य ही मंगल कामना है।
विकास एवं जागृति ही संपूर्ण प्रकृति का अभीष्ट है। इसका प्रत्यक्ष रूप प्रकृति की विधा एवं उसकी तात्विक स्थितिवत्ता है जो “गठनपूर्णता”, “क्रियापूर्णता” एवं “आचरणपूर्णता” है। इसी श्रृंखला में मानव तथा मानवीयता वस्तुगत, वस्तुस्थिति सत्य के रूप में प्रत्यक्ष हैं।
मानव की परिभाषा एवं मानवीयता की व्याख्या से यह स्पष्ट हो चुका है कि मानवीयता में ही सामाजिकता की संभावना स्पष्ट रहती है। साथ ही, मानवीयता से परिपूर्ण होने के अनंतर अतिमानवीयताधिकार संभव है।
अखण्डता ही मानवीयता पूर्ण लक्ष्य एवं कार्यक्रम को निर्विरोध पूर्वक वहन करने योग्य सामर्थ्य सम्पन्न जनमानस ही जागृत और अखण्ड समाज परंपरा है।
जीवन लक्ष्य सुख शान्ति, सन्तोष, आनन्द है जिसके लिए मानव बौद्धिक समाधान, भौतिक समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व में प्रमाणित होना चाहता है। इसीलिए कार्यक्रम है।
जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के आद्यान्त कार्यक्रम की उपलब्धि केवल भौतिक समृद्धि और बौद्धिक समाधान है। इसका अनुभव ही सुख व समाधान है। ऐसी अनुभव क्षमता की निरंतरता में मानव सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द एवं परमानन्द को अनुभव करता है।
मानव जाति के समस्त “कार्यक्रम का उद्देश्य अनुभव एवं प्रमाण ही है।” बौद्धिक समाधान के बिना अनुभव संभव नहीं है, क्योंकि समाधान की निरंतरता ही अनुभव है। भौतिक समृद्धि के बिना बौद्धिक समाधान सिद्ध नहीं है और बौद्धिक समाधान के बिना भौतिक समृद्धि प्रमाणित नहीं होती क्योंकि अज्ञात को ज्ञात करने के लिए एवं अप्राप्त को प्राप्त करने के लिए अनवरत प्रयास हुआ है।
विवेक व विज्ञान का संतुलनाधिकार सहज प्रमाण ही भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान है।
कर्माभ्यास के बिना उत्पादन एवं समृद्धि तथा व्यवहाराभ्यास के बिना समाधान नहीं है।