मध्यस्थ क्रिया की गरिमा ही अनुभव एवं अनुभव में निष्ठा में, से, के लिए प्रयास है। यही जागृति क्रम श्रृंखला तथा स्थितिवत्ता का द्योतक है।
मध्यस्थ क्रिया (आत्मा) में ही अनुभव में प्रवृत्त रहने, अनुभव से प्रभावित होने और प्रभावित करने तथा अनुभव के लिए जागृतिशील रहने की संभावना एवं अवसर है, क्योंकि अनुभव आत्मा में ही होता है, अनुभव मध्यस्थ है। यह मनुष्य के उत्पादन में नियम, व्यवहार में न्याय, विचार में समाधान एवं अनुभव मात्र में सत्य है साथ ही मानव जीवन में, से, के लिए प्रमाण भी है। सम और विषम क्रियाएं मध्यस्थ क्रिया से अनुशासित है ही, साथ ही अनुसरण, अनुकरण व अनुगमन के लिए भी बाध्य हैं।
प्रकृति का मध्यस्थ सत्ता में सम्पृक्तताधिकार ही क्रिया, विकास एवं जागृति के लिए कारण है। जागृति पूर्वक पाया जाने वाला चरमोत्कर्षाधिकारी ही अनुभव है। यही मध्यस्थ क्रिया की आरुढ़ता है, ऐसी अर्हता पर्यन्त जागृतिशीलता है।
अनुभव एवं समाधान चैतन्य प्रकृति में चरितार्थ हुआ है न कि जड़ (भौतिक रसायनिक) क्रिया में।
चैतन्य प्रकृति का परिमार्जन संस्कार पूर्वक होता है। स्वभाव, दृष्टि, प्रवृत्ति, वृत्ति एवं निवृत्ति के रूप में प्रत्येक क्रिया प्रत्यक्ष है, जिसकी सम्यकता (पूर्णता) की कामना व प्रयास है।
जागृति के क्रम में न्याय की याचना व कामना को आचरण में स्वीकारने एवं उसमें निष्ठा प्रकट करने की क्षमता ही सम्यक संस्कार है। यही वर्ग बंधन से मुक्ति है। साथ ही, अखण्ड सामाजिकता का प्रधान लक्षण भी है।
सम्पूर्ण आस्वादन जड़ शरीर के लिए पोषक या शोषक सिद्ध हुए हैं। सम्पूर्ण स्वागत क्रियाएं चैतन्य सीमान्तवर्ती उपादेयी हैं, जो संस्कार है। यही शिक्षा, अध्ययन, अनुसंधान व अनुभूति है, जिसके बिना मानव जीवन की सफलता सिद्ध नहीं होती है।
“जाने हुए को मानना और माने हुए को जानना ही अभ्यास है।” अभ्यास का प्रत्यक्ष रूप निपुणता, कुशलता तथा पाण्डित्य की चरितार्थता है यही उसकी प्रतिष्ठा एवं आप्त कामना भी है।
मानवीय आचरण में प्रतिष्ठित निष्ठा ही सम्यक आचरण एवं व्यवहार है। साथ ही, यही समाधान और समृद्धि भी है।