धर्म सफलता ही जीवन की सफलता है। धर्माकाँक्षा विहीन मानव नहीं है। इसीलिए धर्म नीति (व्यवहारान्वयन क्रिया) सदुपयोग प्रधान एवं राज्यनीति सुरक्षा प्रधान, व्यवहार एवं आचरण प्रक्रिया है। इसी सत्यतावश “नीतित्रय” भी समाज के मूल में समाहित है।
प्रत्यक्ष अनुमानागम क्रियाएं मानव द्वारा चरितार्थ हुई है। इसी विशेषतावश उत्पादन, व्यवहार एवं अनुभव योग्य विचार सम्पन्न होने की पूर्ण संभावना स्पष्ट हुई है। मानव के लिए यही अनुपम अवसर है। यही अवसर अभ्युदय के लिए उत्प्रेरित करता है।
मानव में ही विकास एवं जागृति दर्शन क्षमता प्रत्यक्ष है। मनुष्येत्तर प्रकृति में अस्तित्व बनाये रखने के लिए पूरकता, उपयोगिता पूर्वक संतुलन को प्रकाशित किया है।
जागृत मानव में पायी जाने वाली अनुभवमूलक चिन्तन से ओत-प्रोत विचार शक्ति ही स्थितिवत्ता का दर्शन, मूल्य दर्शन एवं प्रमाणीकरण करती है, इसी से संतुलन और सार्वभौमता व अखण्डता प्रमाणित होना पाया जाता है। साथ ही निर्धारण एवं निश्चय पूर्वक अनुसरण व अनुमोदन क्रिया को सम्पन्न करती है।
विचार विहीन मानव नहीं है। विचार के अभाव में प्रमाण सिद्ध नहीं है। मानव का मूल रूप विचार है।
समाज का लक्ष्य
1. अभयता,
2. भौतिक समृद्धि,
3. बौद्धिक समाधान, जिसका प्रत्यक्ष रूप अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था (वर्ग सीमाओं से मुक्त एवं भ्रम व भय से मुक्ति) है।
मानव के अभ्युदय का प्रत्यक्ष रूप अखण्ड सामाजिकता ही है। यही समाज के संतुलन को प्रकट करती है, यही अभय है।
कृषि, पशुपालन तथा प्रौद्योगिकी से ही भौतिक समृद्धि प्रसिद्ध है। इसके लिए पर्याप्त निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्याधिकार अनिवार्य है, जो सामान्य और महत्वाकाँक्षा की सीमा में चरितार्थ होता है।
बौद्धिक समाधान मानवीयता में प्रत्यक्ष है, जिसकी पूर्ण संभावना और अनिवार्यता भी है।